अल्लाउद्दीन खिलजी का इतिहास

अल्लाउद्दीन खिलजी, खिलजी साम्राज्य का सुल्तान था और उसे खिलजी साम्राज्य का सबसे ज्यादा शक्तिशाली शासक माना जाता है. अल्लाउद्दीन के शासनकाल में बहुत कुछ ऐसा हुआ जिसके कारण उसका नाम आज भी लोगों के बीच में Discuss किया जाता है |

आइए जानते हैं उन घटनाओं के बारे में और यह भी जानते हैं कि इन घटनाओं में अल्लाउद्दीन को जिस तरह से दिखाया जाता है, क्या वह वैसा ही था? आइए जानते हैं अल्लाउद्दीन का पूरा जीवन विस्तार से. 

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अल्लाउद्दीन खिलजी का जन्म

अल्लाउद्दीन का जन्म 1266 में अफगानिस्तान में हुआ था. उसकी शुरुआती लाइफ काफी struggle से भरी थी. बचपन से अल्लाउद्दीन ने एक सपना देखा था |

उसे दुनिया का दूसरा एलेक्जेंडर बनना था और पूरी दुनिया पर राज करना था, हालांकि अल्लाउद्दीन दुनिया के लिए एलेक्जेंडर तो नहीं बन पाया लेकिन उसके Followers उसे सिकंदर – ए – सानी, यानी कि अभी के समय का सिकंदर कहकर बुलाया करते थे. इससे अल्लाउद्दीन को संतुष्टि तो मिल ही जाया करती थी |

हालांकि उसने दुनिया को जीतने के अपने सपने को आखिरी साँस तक नहीं छोड़ा था लेकिन उसके लिए यह सफर काफी मुश्किल था. 

अल्लाउद्दीन खिलजी का राजनीतिक सफर

अल्लाउद्दीन के सफर की शुरुआत होती है, उसके Amir-i-tuzuk बनने से. यह पदवी अल्लाउद्दीन के चाचा और उसके पहले के सुल्तान jalaluddin द्वारा उसे शुरुआती सालों में दी गई थी. दरअसल Jalaluddin अल्लाउद्दीन से काफी खुश था |

अल्लाउद्दीन की बहादुरी पर jalaluddin को काफी ज्यादा गर्व था. हालांकि jalaluddin को यह डर भी था कि यही बहादुरी एक दिन दो धारी तलवार बनकर उसका गला भी काट सकती है इसलिए उसने अल्लाउद्दीन को ऐसी पदवी दी जिसका मह्त्व बहुत ही कम था. 

हालांकि अल्लाउद्दीन की जिज्ञासा और लालच ने उसे इस पद पर बहुत ज्यादा दिनों तक रहने नहीं दिया. साल 1291 आया और jalaluddin ने अल्लाउद्दीन को कारा भेज दिया. कारा के बारे में आपको शायद पता ना हो क्योंकि यह अपने वास्तविक आस्तित्व में मौजूद नहीं है |

लेकिन यह गंगा किनारे बसा एक शहर था जो कि जौनपुर के पास पड़ता था. एक समय कारा का राजा जयचंद हुआ करता था. वही जयचंद जिसकी दगाबाजी के किस्से बहुत प्रसिद्ध है. हालांकि यह अल्लाउद्दीन के कारा जीतने के काफी पहले की बात है |

अल्लाउद्दीन को एक तरीके से उसकी क्षमता साबित करने के लिए कारा भेजा गया और वहाँ जाकर उसने कारा को जीता और वहाँ का गवर्नर बन गया. कारा की जीत के साथ ही अल्लाउद्दीन की शादी jalaluddin ने अपनी बेटी मल्लिका-ए-जहां के साथ करवा दी |

हालांकि मल्लिका-ए-जहां को यह शादी बिल्कुल भी मंजूर नहीं थी और इसी कारण उन दोनों के बीच काफी विवाद भी रहते थे. कारा और दिल्ली काफी दूर दूर रहे, इसलिए jalaluddin ने कारा पर कभी खास ध्यान नहीं दिया |

लेकिन Jalladuin की बेगम और मल्लिका-ए-जहां की मां को लगता था कि अल्लाउद्दीन अपना नया साम्राज्य बसाने की सोच रहा है, जो कि सच भी था. 

साल बीतते गए और Jalaluddin ने अवध पर भी अपना कब्जा कर लिया. अवध पर कब्जा करने के बाद वह यह समझ गया कि दक्षिण भारत में भी बहुत सारे राज्य हैं जिन्हें जीता जाना चाहिए. उसने देवगिरी पर हमला कर दिया |

यहां हमला करने से उसे बहुत सारे संसाधन लूट में मिले जो कि उसने अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए खर्च कर दिए. उसने Jalaluddin के खिलाफ क्रांति कर दी. Jalladuin की बेगम को हमेशा से लगता था कि उसका कत्ल अल्लाउद्दीन के हाथों ही होगा, और यही हुआ. अल्लाउद्दीन ने jalaluddin के साथ उसके बेटों को भी मौत के घाट उतार दिया. 

दिल्ली का सुल्तान

दिल्ली का नया सुल्तान बनने के बाद अल्लाउद्दीन को आंतरिक खतरों के साथ साथ एक और खतरे से लड़ना था जो कि था मंगोलों का आक्रमण. मंगोलों ने कई बार दिल्ली पर हमला किया. जरन मंजूर में साल 1297 में, सिविस्तान में 1298 में, किलि में 1299 में, दिल्ली में 1303 में और अमरोहा में साल 1305 और 1306 में अल्लाउद्दीन और मंगोलों का आमना सामना हुआ. इस दौरान अल्लाउद्दीन का पलड़ा ही भारी रहा और उन्हें लौटकर जाना पड़ा. 

जिस दौरान मंगोल अलाउद्दीन पर आक्रमण कर रहे थे उसी समय अल्लाउद्दीन उनसे तो लड़ ही रहा था और बाकी राज्यों को भी जीत रहा था. इसमे 1299 में जीता गया गुजरात, 1301 में रणथम्भौर, 1303 में चित्तौड़ और 1305 में मालवा था |

चित्तौड़ में तो उसे जीतने में 8 महीने से भी ज्यादा का समय लग गया था. हालांकि इन सब राज्यों को जीतने, मंगोल से लड़ने और इनकी सत्ता को बनाए रखने के लिए उसके बहुत सारे सैनिक खत्म हो रहे थे. पर खिलजी ने इन सब की परवाह किए बिना युद्ध जारी रखे |

उसने 1308 में देवगिरी पर कब्जा कर लिया, 1310 में वारंगल में और 1311 द्वारसमुद्र पर कब्जा कर लिया. ये कब्जे इतने ज्यादा भयानक थे कि इसके दौरान वहाँ की आधी से भी ज्यादा जनसँख्या को मौत के घाट उतार दिया जाता था |

इस बुरी हालत को देखते हुए यादव साम्राज्य के राजा रामचन्द्र को, Hoysala साम्राज्य के राजा बल्लाला तृतीय को और Kakatiya राजा प्रताप रुद्र को अल्लाउद्दीन का दरबारी बनना पड़ा.

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पंड्या साम्राज्य पर कब्ज़ा

खिलजी के मुख्य सेनापति मलिक काफूर ने पंड्या साम्राज्य पर भी हमला किया था और वहाँ से भारी संसाधन लूट लिए थे. 

हालांकि उस समय पंड्या साम्राज्य ने उनका डटकर सामना किया और उन्हें कब्जा नहीं करने दिया लेकिन राजा रामचन्द्र, राजा प्रताप रुद्र और राजा बल्लाला तृतीय के अल्लाउद्दीन के साथ मिल जाने के कारण पंड्या साम्राज्य के लिए मुश्किलें खड़ी हो गईं थीं |

इसका एक कारण यह भी था कि पंडया साम्राज्य में आंतरिक कलह भी चल रही थी. पंड्या साम्राज्य और अल्लाउद्दीन के बीच घमासान युद्ध हुआ. अल्लाउद्दीन की तरफ से राजा रामचन्द्र, राजा प्रताप रुद्र और राजा बल्लाला तृतीय मौजूद थे और पंड्या साम्राज्य की तरफ से मंगोल उनका साथ देने के लिए मौजूद थे |

हालाँकि पंड्या साम्राज्य की हार हुई. वहाँ के दोनों राजा वीर और सुंदर भाग गए. Historians द्वारा यह बताया जाता है कि जब अल्लाउद्दीन को पता चला कि मंगोलों ने पंड्या साम्राज्य का साथ दिया है तो उसने कत्लेआम मचा दिया और 20 से 30 हजार मंगोलों को मौत के घाट उतार दिया. उनके कई सेनापति भी दिल्ली के चौराहों पर मारे गए.. 

इस सब के दौरान मल्लिक काफूर का कद सल्तनत में बढ़ता ही जा रहा था. साल 1313 में उसे देव गिरी का गवर्नर बन गया. यह वही समय था जब अल्लाउद्दीन को एक बीमारी लग गई थी. वह बहुत चिड़चिड़ा और गुस्सैल हो गया था. उसे केवल एक ही इंसान पर भरोसा था, वह था मलिक काफूर |

मलिक काफूर ने उठाया फायदा

मलिक काफूर यह भली भांति जानता और इसका फायदा उठाते हुए उसने अल्लाउद्दीन के हर करीबी को सत्ता से हटवा दिया. 

सबसे पहले उसने उन अधिकारियों को निकलवाया जो कि अल्लाउद्दीन के शासन काल में Economic reforms लेकर आए थे. जैसा कि आप जानते ही होंगे, अलाउद्दीन के समय की अर्थव्यवस्था को काफी बेहतर माना जाता था.

ऐसा इसलिए था क्योंकि यह अर्थव्यवस्था देश के हर हिस्से में बराबर थी और सब हिस्से बराबर होने के कारण यह तय करना मुश्किल हो जाता था कि कहां पहले हमला किए जाए. 

अल्लाउद्दीन के दरबार से पहले तो ऐसे अधिकारी निकाले गए. फिर नंबर आया आसपास के करीबियों का. मलिक काफूर ने हर इंसान को, जो भी उसका Rival बन सकता था, उसे अल्लाउद्दीन पर जान का खतरा बताकर मरवा दिया. इसमे उसका साला अल्प खान मौजूद था.

अल्प खान अलाउद्दीन का वफादार था, लेकिन उसे भी जान से हाथ धोना पड़ा. आगे सारे वजीर भी हटा दिए गए और मलिक काफूर वायसराय बन गया. उसके बाद 4 जनवरी, 1316 की रात काफूर अल्लाउद्दीन के महल से उसकी लाश लेकर निकला. अल्लाउद्दीन को अपनी मौत का बहुत डर था. उसने मौत के डर से सबको खुद से अलग करवा दिया था. वो डरता था कि जो उसने Jalaluddin के साथ किया, वही उसके साथ ना हो जाए. 

अल्लाउद्दीन की मौत के बाद, काफूर ने उसके बेटों को अंधा करके उसके बेटे शहाबुद्दीन को गद्दी पर, पुतला बनाकर बैठा दिया. हालांकि अल्लाउद्दीन के सबसे बड़े बेटे ने काफूर को मारकर गद्दी छीन ली. यह था सुल्तान मुबारक खान. 

तो दोस्तों यह थी अल्लाउद्दीन खिलजी की कहानी. 

Mohan

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