कौन है असली ब्राह्मण और क्या हैं ब्राह्मण के गुण

तो दोस्तो आज हम जानेंगे कि व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण होता है कि अपने गुणों से । जो लोग अपने आप को ब्राह्मण होने का दावा करते हैं उन्हें ब्राह्मण होने के गुणों के विषय मे एक बार अवश्य ही विचार करना चाहिए ।

ब्राह्मण कुल में जन्म लेने से कोई ब्राह्मण नही कहला सकता । ब्राह्मण कहलाने के लिए भगवान कृष्ण द्वारा भगवद गीता में बताये गए ब्राह्मण के गुण होना बहुत ही आवश्यक है ।

ब्राह्मण के गुण

जो खुद को केवल जन्म के आधार पर ही ब्राह्मण मानते हैं उनकी भगवान कृष्ण द्वारा भगवद्गीता में भर्त्सना की गई ।

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।

तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥

(अध्याय 4. श्लोक 13)

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“प्रकृति के त्रिगुणों और नियत कर्मो के अनुसार चारो वर्ण मेरे द्वारा रचे गए हैं परंतु इस व्यवस्था का कर्ता होने पर भी तू मुझ अविनाशी को अकर्ता ही जान ।”

सामाजिक संस्था जिसे वर्णाश्रम धर्म के रूप में जाना जाता है – समाज को सामाजिक जीवन के चार प्रभागों और चार व्यावसायिक विभाजनों या जातियों में विभाजित करने वाली संस्था – का अर्थ जन्म के अनुसार मानव समाज को विभाजित करना नहीं है।

इस तरह के विभाजन शैक्षिक योग्यता के संदर्भ में हैं। उन्हें समाज को शांति और समृद्धि की स्थिति में रखना है। यहां बताए गए गुणों को एक व्यक्ति को आध्यात्मिक समझ में प्रगति करने के लिए पारगमन गुणों के रूप में समझाया गया है ताकि वह भौतिक दुनिया से मुक्त हो सके ।

एक सच्चा ब्राह्मण जिसके पास कोई भौतिक संपत्ति नही है वह भिक्षा मांग करके गुजारा चलाता है। परंतु एक ब्राह्मण जो एक पेशेवर पुजारी के माध्यम से धन अर्जित करके खुशी प्राप्त करने की इच्छा रखता है उसे बहुत ही निम्न सोच वाला धूर्त कहा जाता है ।

आप ऐसे ब्राह्मण को ब्राह्मण कैसे स्वीकार कर सकते हैं । एक उच्च कोटि का ब्राह्मण भिक्षा मांग करके ही तृप्त रहता है। वह अपने शिष्य या यजमानो से किसी भी प्रकार का धन या उपहार कभी नही लेता । भगवान की कृपा पर ही आश्रित रहता है ।

कुछ साल पहले ही कि बात है नवदीप के पास स्थित कृष्णनगर में एक ब्राह्मण को स्थानीय जमीदार राजा कृष्ण से कुछ मदद की पेशकश की गई थी । परंतु ब्राह्मण ने मदद लेने से इनकार कर दिया ।

उन्होंने ने कहा चूंकि वह अपने ग्रहस्थ जीवन मे बहुत खुश है इसलिए वे अपने शिष्यों द्वारा दिये गए चावल और इमली के पत्तो की सब्ज़ी बनाकर खाते थे, जमीदार से मदद लेने का कोई सवाल ही नही था।

निष्कर्ष यह है कि यद्यपि एक ब्राह्मण को अपने शिष्यों से बहुत अधिक सम्मान प्राप्त हो सकता है , लेकिन उसे अपने निजी लाभ के लिए अपने यजमानो के पुरस्कार का उपयोग नही करना चाहिए , वह उन्हें भगवान की सेवा के लिए इस्तेमाल कर सकता है । ( श्रीमद्भागवत छठा स्कन्द )

एक ब्राह्मण को समाज के तीन अन्य वर्गों के आध्यात्मिक गुरु के रूप में माना जाता है, अर्थात्, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र ।

ब्राह्मण के गुण – 9 Qualities of Brahman in Hindi

ब्राह्मण कहलवाने के लिए ब्राह्मण के गुण होना बहुत आवश्यक है | इन 9 ब्राह्मण के गुणों के आधार पर एक सच्चे ब्राह्मण की पहचान की जा सकती है |

शांति , आत्मसंयम , तप , पवित्रता , सहिष्णुता , सत्यनिष्ठा , ज्ञान ,विज्ञान और भक्ति विश्वास

शांति

एक ब्राह्मण का कोई दुश्मन नही होता वह शांतिपूर्ण होता है और उसकी सभी विशेषताएं उदात्त हैं । एक व्यक्ति जो बहुत शांत है , विचार करने वाला है उसे धीर-प्रशांत कहा जाता है ।

मन की स्थिरता का होना बहुत जरूरी है । यहाँ प्रशांत शब्द का अर्थ है मन का संतुलन । क्योंकि मन की गति वायु से भी तेज है । अगर मन स्थिर नही होगा तो कोई कैसे शांत हो सकता है ।

आत्मसयंम

ब्राह्मण आत्मसंयमी होता है । उसका मन बहुत दृढ़ होता है । वह अपनी बुद्धि के माध्यम से अपनी इन्द्रियों को संयमित करता है ।

वह किसी भी चीज़ की अति नही करता। हर काम को सयंमित ढंग से निभाता है । चाहे वो खाने की बात हो या कुछ आनंद लेने की बात हो । हर काम मे वह संयमित रहता है ।

तप

ब्राह्मण हो और तप न करे ऐसा हो ही नही सकता । बिन तप तो कोई ब्राह्मण कहला भी नही पाएगा । एक ब्राह्मण अपने जीवन मे विभिन्न प्रकार के तप करता है जैसे व्रत पालन करना, केवल भगवान को अर्पित खाद्य पदार्थ खाना अर्थार्त बाहर का कुछ भी नही खाना जो भगवान को अर्पित न हो इत्यादि ।

सवेरे जल्दी उठना , स्नान करना , भगवान की पूजा अर्चना करने ये सब तप के अतंर्गत ही आते हैं ।

पवित्रता

एक ब्राह्मण पवित्र होता है मन और ह्रदय दोनों से । ब्राह्मण सतोगुण में होता है । इसलिए उसके सारे कार्य मे पवित्रता दिखलाई पड़ती है । वह किसी भी प्रकार के द्वेषवादी विचार किसी के प्रति मन मे नही रखता ।

वह किसी को भी भ्रमित या लूटना नही चाहता , जैसे आजकल के तथाकथित ब्राह्मण लोग करते हैं । ब्राह्मण कामवासना से रहित होता है । उसके पास ये सब सोचने का वक्त ही नही होता ।

वह हर समय भगवान की सेवा करने और लोगो को अच्छी शिक्षा देने में व्यस्त रहता है । इस प्रकार ब्राह्मण का पवित्र होना अति आवश्यक है ।

सहिष्णुता

ब्राह्मण बहुत ही सहनशील होता है । वह अपने रुचि कार्य संपूर्ण न होने पर भी निराश या क्रोधित नही होता । बल्कि यह समझ के सहन करता है कि इसमें भगवान की इच्छा निहित है ।

वह धन के पीछे नही भागता कि उसका गुजारा कैसे चलेगा, वह भगवान की कृपा पर निर्भर रहता है और सभी प्रकार के कष्टों को भगवान की कृपा स्वरूप स्वीकार करता है या कह सकते है सहन करता है ।

लेकिन हम देखते हैं कि आजकल के तथाकथित ब्राह्मण कैसे अपने अहंकार वश नीच जाति वाले लोगो से अपने आप को वरीय समझते हैं और उन पर अपनी धौंस जमाते हैं । ये ब्राह्मण बिल्कुल भी नही कहलाये जा सकते ।

परंतु अगर कोई व्यक्ति भगवान के बारे में कुछ गलत बोलता है तो असली ब्राह्मण उसे बिल्कुल भी सहन नही करता । वह उन लोगो के मत का बराबर कटाक्ष करता है ।

इस से पता चलता है कि उसे अपने रुचि कार्यों से कोई मतलब नही परंतु भगवान विषयक चीज़ों की आलोचना वह नही सुन सकता । यह असली ब्राह्मण के गुण है ।

सत्यनिष्ठा

सत्य का अर्थ एक मायने में होता है कि कभी झूठ न बोलना । लेकिन वास्तविक सत्य का अर्थ है पूर्ण सत्य को जानना , परम सत्य को जानना । अगर कोई ब्राह्मण परम सत्य के विषय मे नही जानता तो वह ब्राह्मण हो ही नही सकता ।

तो सत्यनिष्ठ होने का तो प्रश्न ही नही उठता । एक ब्राह्मण सदैव परम सत्य के विषय को जानने के लिए ललायित रहता है । वह सांसारिक मामलो में नही पड़ना चाहता जो कि सब मिथ्य है , झूठा है । बाहरी रूप से भी देखा जाए तो एक ब्राह्मण आंतरिक और बाह्य रूप से समान रहता है ।

उसके मन मे कोई द्वेष की भावना नही होती । वह अपने फायदे के लिये किसी से झूठ नही बोलता । जैसे कि हम देखते हैं कि आजकल के तथाकथित ब्राह्मण लोग कैसे लोगो को उल्टी सीधी पट्टी पढ़ा के, 2-4 झूठ बोल के उन्हें भ्रमित करते हैं वो भी सिर्फ धन के लालच में ।

ये सब ब्राह्मण नही है ढोंगी है । ढोंग रचते हैं धन के लिए , और हम मूर्ख लोग इनकी बातो में आ भी जाते हैं । हम ऐसे ब्राह्मणों से बचना चाहिए ।

ज्ञान

एक ब्राह्मण को जीवन के हर क्षेत्र के विषय मे ज्ञान होता है क्योंकि वह विभिन्न शास्त्रो का नियमित अध्ययन करता है। शास्त्रो से अर्जित ज्ञान को वह सार रूप में या कभी कभी विस्तार रूप में सब को वितरित करता है। वह यह किसी लोभ के लालच में नही करता ।

समाज का मुखिया होने के नाते उसका यह कर्तव्य होता है कि वह समाज के अन्य लोगो जैसे क्षत्रिय , वैश्य व शुद्र आदि को परम सत्य के बारे में अवगत कराये।

लेकिन आजकल के तथाकथित ब्राह्मण केवल अपनी आजीविका कमाने के लिए 2-4 पंडिताई की किताब पढ़ करके सब लोगो को भ्रष्ट करते हैं । ये सब झूठे है , ढोंगी है , मक्कार है । एक असली ब्राह्मण ये सब नही करता ।

विज्ञान

ब्राह्मण सिर्फ ज्ञान देता है नही उस ज्ञान को वह अपने जीवन मे लागू भी करता है । वह सबके लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि विज्ञान का होना बहुत आवश्यक है यहां शब्द विज्ञान अर्थ व्यवहारिक ।

मतलब जो ज्ञान हम अर्जित करते है उसे अपने व्यवहार में लाना भी बहुत जरूरी है वर्ना ऐसे मानसिक ज्ञान का क्या फायदा अगर हम इसे व्यवहार में नही लाते । तो एक असली ब्राह्मण व्यवहारिक रूप से भरपूर सक्षम होता है ।

ऐसा नही है कि वह केवल बोलता रहे ये करो वो करो और खुद कुछ नही करता तो ऐसे ब्राह्मण धूर्त है । वे ब्राह्मण नही है ।

भक्ति-विश्वास

भक्ति शब्द का अर्थ है भगवान की प्रेममयी सेवा । तो एक असली ब्राह्मण का स्वभाव होता है कि वह हर समय भगवान की सेवा में संलग्न रहना चाहता है। वह हर समय यही विचार करता कि किन कार्यो से भगवान खुश होते हैं ।

क्योंकि उसका भगवान पर पूर्ण विश्वास होता है । वह भगवान पर निर्भर रहता है। भगवान को ही सब कार्यो का कर्ता मानता है । वह आजकल के तथाकथित ब्राह्मणों की तरह यह विचार नही करता रहता कि लोगो को कैसे ठगा जाए । वह केवल भगवान की शरण ग्रहण करता है ।

Mohan

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