हरी सिंह नलवा का इतिहास

भारत वीरो की धरती है और वीर भी ऐसे ऐसे जो सिर्फ कुशल फाइटर ही नहीं थे बल्कि उनके दिल में सच्चाई, देश रक्षा की भावना के साथ साथ सभी धर्मो का बराबर सत्कार मान सम्मान था | भारत के ये वीर दुश्मनों के लिए काल और दोस्तों के लिए फ़रिश्ता रहे हैं | आइये जानते हैं Sikh Sardar Hari Singh Nalwa History in Hindi.

हरी सिंह नलवा की कहानी वीडियो के माध्यम से

इस देश की धरती समय समय ऐसे वीरो को जनम देती रही है आज हम आपको बताने जा रहे हैं भारत देश के एक महान योद्धा, कुशल सिपेसलाहर और मात्र भूमि के लिए मर मिटने वाले एक ऐसे सरदार की कहानी जो सिर्फ नाम से ही सिंह नहीं था बल्कि उसके नाम के साथ शेर का नाम जोड़ा गया |

जिसकी वीरता के चर्चे दूर दूर तक थे | जिसने अफगानिस्तान तक भारत का परचम लहराया था | जिसका नाम सुनकर ही अफानिस्तान के बड़े बड़े सूरमा घबरा जाते थे और जिसके विजय रथ को रोकना सबके लिए असंभव सा हो गया था |

इस योद्धा ने जिस प्रदेश को जीता वहां के लोग दुखी नहीं बल्कि सुखी हो गये क्यूंकि इस योद्धा ने वहां पर भी धर्म का राज्य स्थापित किया |

चोरी, लूटमार, हत्या , जबरदस्ती को ख़तम कर राम राज्य स्थापित किया | इस वीर के मन में जीते हुए प्रदेशो की जनता के प्रति द्वेष नहीं था और ये वीर उनकी माँ, बेटियों का सम्मान करता था |

जी हाँ दोस्तों भारत का वो वीर था ” हरी सिंह नलवा “

ये भी पढ़े: महाराजा रणजीत सिंह का इतिहास

हरी सिंह नलवा का इतिहास – Hari Singh Nalwa History in Hindi

sikh sardar hari singh nalwa history in hindi

हरी सिंह नलवा का जनम

हरी सिंह नलवा का जनम गुजरावालां पंजाब में सन 1762 में उप्पल परिवार में हुआ था | हरी सिंह ने वीरो के घर में जनम लिया था |

क्यूंकि उनके दादा हरदास सिंह जी अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ लड़ते हुए मारे गये थे | इसलिए हरी सिंह के खून में ही वीरता और साहस कूट कूट कर भरा हुआ था |

हरी सिंह के मन में बचपन से ही सिख धर्म के नियमो को दिल से मानने और इंसानियत की रक्षा करने की भावना जनम ले चुकी थी |

महाराजा रणजीत सिंह

उस समय पंजाब पर सरदार रणजीत सिंह का राज था जो भारत और पूरी दुनिया में सबसे पहले एक सेना का गठन करने वाले राजा थे | जिन्होंने अपने सैनिको की युद्ध शिक्षा के लिए विदेशी आर्मी जनरलों को भी बुलाया था |

आज भी पाकिस्तान में फ्रेंच generals की कब्रे हैं जो भारत में सिख सैनिको को शिक्षा देने आये थे | महाराजा रणजीत सिंह ने केवल युद्ध शिक्षा ही नहीं बल्कि अपनी प्रजा और सेना को भी विदेशी भाषाओं की शिक्षा तक दिलवाई |

पंजाब जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में भी उसने महाराजा रणजीत सिंह को भूला दिया है या ऐसा भी कह सकते हैं की वहां के हुक्मरानों ने लोगो का memrocide कर दिया है |

लेकिन भारत इस न्याय प्रिय और शक्तिशाली राजा को नहीं भुला है और हीरे के पहचान जोहरी ही कर सकता है | इसलिए सन 1804 जब एक बार महाराजा रणजीत सिंह ने आर्मी की भर्ती निकाली तो हरी सिंह भी उसमे भाग लेने पहुंचे |

हरी सिंह के घुड़सवारी और युद्ध कोशल से महाराजा रणजीत सिंह बहुत प्रभावित हुए और उन्हें अपनी सेना का सिपेसलार बना दिए |

हरी सिंह ने जब फाड़ डाला शेर का जबड़ा

इसी साल हरी सिंह ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया जिसके बाद रणजीत सिंह ने हरी सिंह को 800 घुड़सवारो की सेना दे दी |

हरी सिंह पर एक शेर ने हमला कर उनके घोड़े को मार डाला जिसके बाद हरी सिंह ने अकेले ही अपनी तलवार से उस शेर को मौत के घाट उतार दिया और अपने हाथो से उस शेर के जबाड़े फाड़ डाले |

उस दिन के बाद हरी सिंह को नलुआ की उपाधि मिल गयी और उन्हें बाघमार भी कहा जाने लगा | नलुआ का अर्थ ही है शेर के तरह पंजो वाला | सच में इस शेर की दहाड़ से पठानों के मन में डर पैदा हो गया था |

इसे भी पढ़ें: लाल किले को फ़तेह करने वाले जस्सा सिंह अहलूवालिया का इतिहास 

अफगानिस्तान तक शासन

हरी सिंह नलुआ कश्मीर, पेशावर और हजारा के गवर्नर रहे | हरी सिंह ने अपने महाराजा रणजीत के शासन का विस्तार ख्यबर दर्रे तक कर लिए था |

हरी सिंह एक कुशल रणनीतिकार थे इसलिए वो जानते थे, किस तरह से विदेशी अक्रमंकारियों से भारत माँ की रक्षा करनी है |

क्यूंकि इससे पहले भारत पर जब भी विदेशी आक्रमण हुए इसी khyber pass से हुए और ये बात भी इतिहास में दर्ज है की इस जगह पर कब्ज़ा करने के बाद इस रास्ते से भारत पर कोई आक्रमण नहीं हुआ |

हरी सिंह नलवा एक महान योद्धा इसलिए भी कहे जाते हैं क्यूंकि उन्होंने अपने से बड़ी बड़ी सेनाओ को हरा कर अपनी विजय का परचम लहराया |

हरी सिंह ने कसूर, सियालकोट, अटलॉक, मुलतान, कश्मीर, पेशावर और जमरूद की बड़ी लड़ाईय लड़ी | पाकिस्तान के एक शहर का नाम हरी सिंह नलुआ के नाम पर हरिपुर शहर रखा गया था | लेकिन पाकिस्तान हरी सिंह की सहादत को भूल चूका है |

हरी सिंह ने ख्यबर दर्रे के नजदीक जमरूद किले का निर्माण किया जिसे हरी सिंह ने अपनी सेना का बेस कैंप बनाया |

अफगानिस्तान के पठान हरी सिंह से खौफ खाते थे लेकिन हरी सिंह ने उनकी बहु, बेटियों की इज्जत की जिसके बारे में एक पठान लड़की बीबी बानो का किस्सा मशहूर है |

ये भी पढ़ें:

हरी सिंह की मृत्यु

हरी सिंह ने जमरूद किले में शेरो की तरह राज किया | लेकिन जब 1837 में महाराजा रणजीत सिंह के पोते की शादी में शामिल होने ज्यादातर सिख सैनिक इस किले से शादी के लिए रवाना हो गये |

तो दुश्मन ने इस मौके का फायदा उठा कर इस किले पर आक्रमण कर दिया | दुश्मन के इस अचानक हुए हमले और दुश्मन की तादात बहुत ज्यादा होने के बाद भी हरी सिंह नलुआ ने उनसे लड़ना जारी रखा |

लेकिन दुश्मन के किये इस आक्रमण में हरि सिंह शहीद हो गए | हरी सिंह ने मरने से पहले अपने सैनिको को आदेश दिया की उनकी मौत की खबर बाहर नहीं जानी चाहिए |

इसलिए बाहर बेठी दुश्मन फ़ौज एक हफ्ते तक हरी सिंह के खौफ में किले पर चढाई नहीं कर सकी और इसी बीच सिख सैनिको के आ जाने से अफगानियों को मैदान छोड़कर भागना पड़ा |

इस बार भारत के इस वीर ने अपनी जान देकर अपनी मात्र भूमि की रक्षा की और अपने देश का झंडा बुलंद रखा |

Mohan

I love to write about facts and history. You can follow me on Facebook and Twitter

Leave a Comment