जस्सा सिंह अहलूवालिया का इतिहास

Jassa Singh Ahluwalia History in Hindi – सन 1783, मार्च का महीना था, उस साल भारत के इतिहास में एक नयी कहानी लिखी जानी थी

सिखों की दिल्ली फ़तेह की कहानी |

ये वो दिन था जब सिख फौज ने बाबा बघेल सिंह, जस्सा सिंह अहलूवालिया और जस्सा सिंह रामगढ़िया के नेतृत्व में लाल किले पर केसरी झंडा लहरा दिया था |

दिल्ली का लाल किला मुग़लों की शानो शौकत और भारत पर उनके लंबे राज का प्रतीक माना जाता है | जिसने दिल्ली के लाल किले पर कब्जा किया उसे पूरे  भारत का शासक माना गया |

अँग्रेज़ों के भारत पर पूरी तरह कब्जा करने से पहले लाल किले पर ज़्यादातर मुगलों का ही अधिकार रहा | लेकिन इतिहास में एक ऐसा समय भी आया था जब सिखों ने लाल किले को अपने कब्ज़े में ले लिया था |

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सिख इतिहास में उस दिन को फ़तेह दिवस के रूप में मनाया जाता है | 26 जनवरी को किसान ट्रेक्टर मार्च के दौरान लाल क़िले पर झंडा फहराने को लेकर बहुत विवाद हुआ था |

तिरंगा भारत की आन बान और शान है और उस दिन भी तिरंगे को किसानो ने कोई नुकसान नहीं पहुँचाया | पर लाल क़िले पर जो केसरी झंडा फहरा दिया गया वो झंडा निशान साहिब का झंडा था |

1783 में भी ऐसा ही कुछ हुआ था यानी की केसरी निशान साहिब को लाल क़िले पर फहराया गया था | उस समय सिख फ़ौजों ने मुग़ल बादशाह शाह आलम को घुटनो पर ला दिया था | 

सिख सेना का नेतृत्व बाबा बघेल सिंह कर रहे थे और उनके साथ थे जत्थेदार जस्सा सिंह आहलुवालिया और जत्थेदार जस्सा सिंह रामगढ़िया |

जस्सा सिंह अहलूवालिया ने इस लड़ाई में बहुत अहम भूमिका निभाई थी |

ये वही जस्सा सिंह अहलूवालिया थे जिन्होने पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद अब्दाली के द्वारा बंदी बनाई गइ 2200 हिंदू महिलाओं को छुड़वाकर उनके घरों तक पहुँचाया था | 

ये भी कहा जाता है कि उन्हें लाल क़िले में बादशाह के पद पर बैठने को कहा गया लेकिन उन्होने मना कर दिया और कहा की सिख धर्म में बादशाह बनने का कोई सिद्धांत नहीं है |

लाल क़िले को जीतने के बाद भी सिखों ने लाल किला वापिस मुग़ल बादशाह शाह आलम को लौटा दिया | और बदले में वो माँगा जिसने सिखों के बलिदानी के इतिहास को दिल्ली में जिंदा रखा |

दिल्ली में कई सिख गुरुओं को शहीद किया गया, इन जगहों पर सिखों ने गुरुद्वारा बनवाने की माँग की | इस माँग को मानते हुए दिल्ली में शाह आलम ने 7 गुरुद्वाराओं का निर्माण करवाया |

जस्सा सिंह अहलूवालिया का बचपन Jassa Singh Ahluwalia Childhood

दिल्ली को जीतने में अहम भूमिका निभाने वाले जस्सा सिंह अहलूवालिया का जन्म लाहौर के गाँव आहलू में 3 मई 1718 को हुआ था |

जब वो सिर्फ़ 4 वर्ष के थे तो उनके पिता की मृत्यु हो गई | जिसके बाद वो अपनी माता के साथ दिल्ली आ गये | दिल्ली में उन्होने गुरु गोबिंद सिंह की धर्मपत्नी माता सुंदरी से आशीर्वाद लिया |

इसके बाद 12 वर्ष की उम्र में वो वापिस पंजाब आ गये | पंजाब में उनकी मुलाकात नवाब कपूर सिंह से हुई | नवाब कपूर सिंह उनकी कीर्तन करने की कला से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें अपने पास रख लिया |

इसके बाद वहीं रहते हुए उन्होने तलवार चलना, घुड़सवारी, तीरन्दाज़ी और युद्ध लड़ने की शिक्षा ली |

युद्ध कला में वो इतने निपुण हो गये थे की उनके युद्ध कौशल को देखकर नवाब कपूर सिंह ने 1748 में उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया | 1753 में नवाब कपूर सिंह की मृत्यु के बाद 1754 में अमृतसर में उन्हें नवाब की उपाधि दी गई |

इस तरह से जस्सा सिंह अहलूवालिया ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और जल्दी ही वो प्रमुख सिख नेताओं में गिने जाने लगे |

1745 तक सिखों को 65 समूहों में बांटा गया था | इन 65 समूहों का पुनर्गठन करके नवाब कपूर सिंह ने इन्हें 11 समूहों में बाँट दिया गया | हर जत्थे का अपना अलग नाम, झंडा और लीडर होता था |

इन्हें बाद में मिसल्स कहा जाने ल्गा | इस तरह बने 11 समूहों की सभा को “दल ख़ालसा” नाम दिया गया और जस्सा सिंह अहलूवालिया को सिखों का कमांडर  नियुक्त किया गया |

अहमद शाह अब्दाली के साथ मुकाबला

1761 में जब सिखों ने लाहोर पर कब्जा कर लिया उस वक़्त जस्सा सिंह को सुल्तान-उल-क्वाम यानी किंग ऑफ द नेशन का खिताब दिया गया |

लाहोर पर कब्ज़े और अहमद शाह अब्दाली के जनरल नूर-उड-दिन बमजई की हार की खबर अफ़ग़ानिस्तान तक पहुँच गइ थी |

जिसके बाद अहमद शाह अब्दाली गुस्से से पागल हो गया और उसने पंजाब पर हमला कर दिया | पंजाब पर अफगानो का ये छेवां हमला था जिसमे उसने सिखों को भारी नुकसान पहुँचाया था |

इधर सिख सतलुज नदी को पार कर चुके थे और सिखों के काफिले में बहुत बड़ी संख्या में योद्धाओं के साथ साथ बच्चे, बूढ़े और औरतें भी थी |

सिखों की कोशिश थी कि बच्चे, बूढ़े और औरतों को सुरक्षित स्थान तक पहुँचा दिया जाए | सिख फौज ज़रूरतमंदों को सुरक्षा देते हुए और लड़ते हुए आगे बढ़ रही थी |

सिख फ़ौजों का नेतृत्व जस्सा सिंह अहलूवालिया के साथ साथ महाराजा रंजीत सिंह के दादा छरहत सिंह सुकरचकिया और हरी सिंह ढिल्लों के हाथ में था |

लेकिन अहमद शाह अब्दाली ने अचानक और जोरदार हमला किया था. दूसरी तरफ सिखों को अब्दाली और भारत में उसके सहयोगियों जिनमें मलेरकोटला  और सरहिंद के नवाब भी शामिल थे उनसे भी लड़ना पड़ रहा था |

अहमद शाह अब्दाली ने सिखों को भारी नुकसान पहुँचाया और भीषण नरसंहार किया |अब्दाली का आदेश था की सिखों को देखते ही मार दिया जाए.

मलेरकोटला के पास कूप गाँव में 20,000 सिखों को एक दिन में मौत के घाट उतार दिया गया |

1762 में हुए इस नरसंहार को वड्डा घल्लुघारा कहा जाता है | अब्दाली के सैनिकों पर नरसंहार करने की भूख इस कदर सवार थी की मलेरकोटला और सिरहिन्द के सैनिकों को अपने सर पर हरी पत्तियों को बांधना पड़ा ताकि वो खुद को सिख फौज से अलग कर सके |

इस लड़ाई में जस्सा सिंह अहलूवालिया के शरीर पर 72 घाव हो गये लेकिन फिर भी वो बच गये | फ़रवरी में वड्डा घल्लुघारा नाम की उस घंटा के बाद सिखों को बहुत नुकसान हुआ था |

अब्दाली को लगा था की अब सिख कभी उसके सामने सर नहीं उठा पाएँगे | पर सिख ऐसी क़ौम है जो कभी हार नहीं मानने वाली थी इसलिए दीवाली पर अमृतसर में पहले से भी ज़्यादा बड़ी संख्या में सिख इकट्ठे हुए | 

ये देखकर अब्दाली एक बार फिर से सिखों को जड़ से उखाड़ने की प्लॅनिंग करने लगा | पर इस बार उसने पहले सिखों को शांति का प्रस्ताव भेजा. सिखों ने उसके इस प्रस्ताव को मानने से इनकार कर दिया |

बस फिर क्या था अब्दाली ने अपनी फौज के साथ अमृतसर की और बढ़ना शुरू कर दिया | पर इस बार अब्दाली को मूह की खानी पड़ी और सिखों ने बहुत बड़ी संख्या में अफगानो को बंदी बना लिया|

इस लड़ाई में हार के बाद अब्दाली वापिस लौट गया था. जस्सा सिंह अहलूवालिया ने उन बंदी बनाए गये सैनिकों से हरमंदिर साहिब के पवित्र सरोवर का पुनर्निर्माण करवाया और उन्हें रिहा कर दिया |

सिखों के इस दया भाव को देखकर बहुत से अफ़ग़ान सैनिक उनसे बहुत प्रभावित हुए और सिख बन गये | इसके बाद भी जस्सा सिंह अहलूवालिया ने अब्दाली के साथ कुछ लड़ाइयाँ लड़ी |

पर इसके बाद जिस विजय एक लिए उन्हें याद किया जाता है वो थी दिल्ली के लाल किले पर फ़तेह |

सिखों की दिल्ली फ़तेह

दिल्ली पर उस वक़्त शाह आलम राज कर रहा था. पर मुगलों की ताक़त बहुत कमजोर हो चुकी थी |

इसलिए एक तरफ मराठे तो दूसरी तरफ अंग्रेज दिल्ली पर अधिकार करना चाहते थे | एक दिन शाह आलम को पता चला की अंग्रेज दिल्ली के लाल क़िले पर कब्जा करने जा रहे हैं |

शाह आलम को अब किसी की मदद चाहिए थी जो उसे अंग्रेजों के हमले से बचा सके |

शाह आलम ने बाबा बघेल सिंह को मड्ड के लिए कहा. तब बाबा बघेल सिंह, जस्सा सिंह अहलूवालिया और जस्सा सिंह रामगढ़िया तीनो की फ़ौजे मिलकर दिल्ली की और चल पड़ी |

तीनो की संयुक्त सेना में 40 हज़ार के करीब सिख सैनिक थे. लेकिन अभी ये सेना दिल्ली पहुँची नहीं थी और शाह आलम को टा चला की अंग्रेज दिल्ली पर हमला नहीं कर रहे.

इसलिए शाह आलम ने सिखों को संदेश भिजवा दिया की उसे उनकी सहयता नहीं चाहिए और वो वापिस लौट जाए.

इस बात को सुनकर सिख फ़ौजें बहुत नाराज़ हुई क्यूंकी इतनी बड़ी सेना को संगठित करके किसी तरफ कुछ करने में बहुत ब्डा खर्च आता है.

बाबा बघेल सिंह, जस्सा सिंह अहलूवालिया और रामगढ़िया ने शाह आलम को कहा की वो उनके वहाँ आने का खर्च उन्हें दे दें तो वो वापिस लौट जाएँगे |

लेकिन शाह आलम ने कोई भी खर्च देने से इनकार कर दिया. इस पर तीनो सेना कॉंमांडरों ने फ़ैसला लिया की शाह आलम को सबक सीखना होगा.

सिखों ने शाह आळम को चेतावनी दी की उनका खर्च दे दिया जाए वरना वो दिल्ली पर हमला कर देंगे | पर शाह आलम ने सिखों की बात नहीं मानी और उन्हें रोकने के लिए दिल्ली के सभी गाते बंद कर दिए और अपनी सेना भेज दी |

सिखों के 5 हज़ार सैनिक मजनू के टिल्ले पर, 5 हज़ार अजमेरी गाते पर और बाकी 30 हज़ार सैनिक सब्जी मंदी और कश्मीरी गाते के बीच खड़े हो गये |

इन तीस हज़ार सैनिकों ने मुगलों की सेना का छक्के छुड़ा दिए और इन्ही 30 हज़ार सैनिकों के कारण ही उस जगह कोर्ट का नाम तीस हज़ारी कोर्ट प्डा.

सिखों ने लाल क़िले पर कब्जा कर लिया और लाल किले के मुख्य द्वार पर केसरी झंडा फेहरा दिया.

लाल किला लौटा कर करवाया गुरद्वारों का निर्माण

शाह आलम किला छोड़कर भाग चुका था.

सुल्तान-उल-क्वाम यानी जस्सा सिंह अहलूवालिया को लाल किले का बादशाह बनने के लिए कहा गया लेकिन उन्होने और जस्सा सिंह रामगढ़िया ने ये कहते हुए इस बात के लिए म्ना कर दिया की सिखी में बादशाहत की कोई जगह नहीं है |

बाद में शाह आलम ने बेगम समरू से गुज़ारिश की की वो उनकी सुलह करवा दे | जिसके बाद बेगम समरू जो की जस्सा सिंह अहलूवालि की बहन बनी हुई उनके कहने पर सिख लाल किले को लौटने के लिए टेयर हो गये

ये फ़ैसला सही भी था क्यूंकी लाल किले पर अधिकार का मतलब पुर हिन्दुस्तान का राजा होने से था और सिखों की ताक़त और आबादी इतने युध अभियानों के बाद इतनी कम हो गयइ थी की वो इतना बड़ा देश नहीं संभाल सकते थे |

इसलिए उन्होने शाह आलम के सामने शर्त रखी की वो दिल्ली में 7 गुरद्वारों का निर्माण करवायें और अपना किला ले लें | इसके अलावा मुघलों के द्वारा वासूले जाने वाला कर का एक हिस्सा सिखों को देने का भी फ़ैसला हुआ |

इसके बाद जस्सा सिंह अहलूवालिया अपने साथ लाल किले से तख्त का एक बड़ा पत्थर अपने साथ लेकर अमृतसर आ गये | ताकि आगे आने वाली पीढ़ियों को सिखों की इस विजय पर हमेशा गर्व रहे |

कहा जाता है की आज भी वो पत्थर अमृतसर में रामगढ़िया बुरज में रखा हुआ है |

इस तरह जस्सा सिंह अहलूवालिया ने महाराजा रंजीत सिंह के लिए वो ज़मीन तैयार कर दी जिसके बाद उन्होने एक बड़े विशाल सिख साम्राज्य की स्थापना की |

महाराजा रंजीत सिंह, महाराजा दुलीप सिंह के बारे में भी आप हमारी वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं | 

जस्सा सिंह अहलूवालिया को हरमंदिर साहिब की मररमत करवाने, अब्दाली का दाँत कर मुकाबला करने और लाल किले पर फ़तेह के लिए सिख इतिहास में बड़े सम्मान से याद किया जाता है.

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Mohan

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