महाराजा रणजीत सिंह का इतिहास

महाराजा रणजीत सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं | उनका नाम पंजाब के इतिहास में सुनहरी अक्षरों में दर्ज है | उनकी वीरता और साहस के किस्से आज भी हर घर में सुनाए जाते हैं |

महाराजा रणजीत ने परम्पराओं को बदलते हुए भारत पर हमेशा से आक्रमण करने वाले अफगानों पर आक्रमण किया था | जो कि भारत में पहले कभी नहीं हुआ था | जिन अफगानों पर आक्रमण करने से पहले हर कोई सोचता था | उन अफगानों पर रणजीत सिंह ने लगाम लगाई थी |

भारत पर जब भी विदेशी आक्रमण हुए खैबर पास से हुए और महाराजा रणजीत सिंह ने इसी खैबर दर्रे पर अपना अधिकार जमा लिया था | | ये बात भी इतिहास में दर्ज है कि इस जगह पर कब्ज़ा करने के बाद इस रास्ते से भारत पर कोई आक्रमण नहीं हुआ |

महाराजा रणजीत सिंह को पंजाब का शेर कहा जाता है |

महाराजा रणजीत सिंह का इतिहास – Maharaja Ranjit Singh History in Hindi

महाराजा रणजीत सिंह का जन्म

बचपन में चेचक की बीमारी की वजह से उनकी बांयी आँख की रोशनी चली गयी थी | लेकिन इस बीमारी और दुनिया से लड़कर उन्होंने अपना, पंजाब और भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया |

रणजीत सिंह का जन्म 13 नवंबर 1780 को गुजरांवाला में हुआ था | उनके पिता महासिंघ सुकरचक्या रियासत के मुखिया थे | उनकी माँ राजकौर जींद के राजा की बेटी थी |

अभी रणजीत सिंह सिर्फ 12 वर्ष के ही हुए थे कि उनके पिता का स्वर्गवास हो गया | 15 वर्ष की आयु में रणजीत सिंह का विवाह कन्हैया रियासत में सदा कौर की बेटी महताब कौर से हुआ था | सदा कौर एक महत्वकांक्षी महिला था |

उसी ने रणजीत सिंह को रामगदिया पर आक्रमण करने की सलाह दी थी | लेकिन इस लड़ाई में रणजीत सिंह विजयी नहीं हो पाए थे | 18 वर्ष की आयु में रणजीत सिंह ने अपनी जागीर का समस्त कार्यभार स्वयं संभाल लिया था |

21 वर्ष की उम्र में ही रणजीत सिंह ‘महाराजा’ की उपाधि से विभूषित किया गया | बाद में यही रणजीत सिंह पंजाब के शेर कहलाए |

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महाराजा रणजीत सिंह

लोगों की सही परख

रणजीत सिंह लोगों की परख में माहिर थे एक तरफ उन्होंने लड़ाई की कमान हरी सिंह नलवा को सौंप रखी थी दूसरी तरफ अंग्रेजों से बातचीत की कमान फ़क़ीर अजिजद्दीन को सौंप रखी थी |

फ़क़ीर अजिजद्दीन अरबी, फारसी और अंग्रेजी भाषाएं जानता था | पेशे से वो एक हकीम था |

महाराजा रणजीत सिंह ने उसे अपने दरबार में जगह दी थी | रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद भी वो खड़क सिंह और शेर सिंह के साथ सिख साम्राज्य के साथ रहा |

महान और दयालु राजा

1801 में बैसाखी के दिन लाहौर में रणजीत सिंह ने अपने आपको एक स्वतंत्र भारतीय शासक के रूप में प्रतिष्ठत किया | उन्होंने बहुत सी छोटी छोटी रियासतों को अपने साथ मिला लिया | उस समय ईस्ट इंडिया कम्पनी लगभग पूरे भारत पर अपना अधिकार कर चुकी थी |

लेकिन महाराजा रणजीत सिंह ने खुद को एक ऐसे राजा के रूप में स्थापित किया जिन पर फ़तेह करना नामुनकिन था | यही वजह थी कि इतनी शक्तिशाली होने के बावजूद भी ईस्ट इंडिया कंपनी पंजाब पर अधिकार नहीं कर पा रही थी |

जहाँ पर रणजीत सिंह का खौफ आस पास की रियासतों और अंग्रेजों में था वही उनकी दयालूता के चर्चे भी सभी तरफ थे |

कहा जाता है कि महाराजा बनने के बाद भी वो सिंहासन की बजाए अपने दरबारियों के साथ बैठना अधिक पसंद करते थे | उनकी दयालुता का पता इस बात से भी चलता है कि इतनी रियासतों को जितने के बाद भी जब तक उन्होंने राज किया तब तक उन्होंने किसी को भी मृत्यु दण्ड की सज़ा नहीं सुनाई |

साथ ही जिस भी रियासत को वो जीतते थे वहां के राजा या नवाब को वो जीवनयापन के लिए कोई न कोई जागीर अवश्य दे देते थे |

महाराजा रणजीत सिंह को उनकी महानता और दयालुता के कारण लाखबख्श भी कहा जाता था |

सभी धर्मों का सम्मान

रणजीत सिंह हिन्दू, मुसलमान और सिख सबको एक समान दृष्टि से देखते थे | उन्होंने अपने शासन में बहुत सी मस्जिदों की मरम्मत करवाई और उन्हें दान भी दिया | हिन्दू मंदिरों में भी उन्होंने बहुत दान दिया | वाराणसी के प्रशिद्ध काशी विशवनाथ मंदिर में रणजीत सिंह ने 22 मन सोना दिया था |

अमृतसर में हरमंदिर साहिब के लिए भी उन्होंने बहुत सोना दान में दिया था |

रणजीत सभी धर्मों को एक नजर से देखते थे इसका प्रमाण एक प्रसंग से मिलता है | जिसमें खुशनवीस नाम का एक मुसलमान पवित्र कुरान शरीफ की बहुत सुन्दर प्रति सोने और चांदी की स्याही से अपने वर्षों की मेहनत से बनाता है |

लेकिन कोई भी नवाब उसकी इस प्रति को नहीं खरीदता | लेकिन जब महाराजा रणजीत सिंह को पवित्र कुरान की ये प्रति दिखाई जाती है तो वो तुरंत उठकर इस पुस्तक को अपने माथे से लगा लेते हैं |

इसके बाद महाराजा रणजीत सिंह अपने वजीर को आदेश देते हैं कि खुशनवीस को इसकी जितनी भी कीमत चाहिए वो दे दी जाए और इस कुरान शरीफ को उनके संग्राहलय में रखवा दिया जाए |

इस पर फ़क़ीर अजिजद्दीन महाराजा रणजीत सिंह को कहते हैं कि आपने इस पुस्तक की बहुत ज्यादा कीमत दे दी है जबकि ये पुस्तक आपके किसी काम की नहीं है | आप एक सिख हैं और ये पुस्तक मुसलमानों की धर्म पुस्तक है |

तब रणजीत सिंह जवाब देते हैं कि फ़क़ीर साहब “ईश्वर की यही इच्छा है कि मैं सब धर्मों को एक नजर से देखूं” |

महाराजा रणजीत सिंह का तेज

महाराजा रणजीत सिंह के चेहरे पर बचपन में चेचक की बीमारी की वजह से दाग पड़ गए थे और उनकी बायीं आँख भी चली गयी थी | फिर भी उनके चेहरे पर एक तेज था |

जब ब्रिटिश गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेटिंक ने फ़क़ीर अजिजमुद्दीन से पूछा की रणजीत सिंह की कौन सी आँख ख़राब है तो फ़क़ीर अजिजमुद्दीन ने उत्तर दिया “उनके चेहरे की भव्यता और चमक इतनी है कि उनके चेहरे को सीधा देखा नहीं जा सकता | इसलिए मुझे नहीं पता कि उनकी कौन सी आँख ख़राब है”

महाराजा रणजीत सिंह की सेना – Maharaja Ranjit Singh Army in Hindi

पुरे भारत पर अंग्रेज अपना शासन कर चुके थे | भारतीय युद्ध नीति और सैन्य बल यूरोपीय सेनाओं के आगे लगभग घुटने तक चूका था | ऐसे में रणजीत सिंह जानते थे कि जब तक उनकी सेना लड़ने के लिए आधुनिक प्रशिक्षण नहीं लेगी तब तक अंग्रेजों का सामना करना मुश्किल होगा |

वो पूरी दुनिया में सबसे पहले एक सेना का गठन करने वाले राजा थे | उन्होंने अपने सैनिको की युद्ध शिक्षा के लिए विदेशी आर्मी जनरलों को भी बुलाया था | आज भी पाकिस्तान में फ्रेंच जनरल्स की कब्रे हैं जो भारत में सिख सैनिको को शिक्षा देने आये थे |

कुछ यूरोपियन जो नेपोलियन की सेना में अपनी सेवाएं दे चुके थे उन्होंने भी रणजीत सिंह की सेना को प्रशिक्षण दिया था |

रणजीत सिंह ने अपने सैनिकों को युद्ध शिक्षा ही नहीं बल्कि अपनी प्रजा और सेना को विदेशी भाषाओं की शिक्षा भी दिलवाई थी |

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महाराजा रणजीत सिंह का युद्ध अभियान

महाराजा रणजीत सिंह ने अपने युद्ध अभियान की शुरुआत जुलाई 1799 में की थी जब उन्होंने पंजाब की राजधानी लाहौर पर अपना अधिकार कर लिया था | इसके एक बाद उन्होंने अमृतसर पर अपना अधिकार जमा लिया |

अंग्रेज इस समय तक महाराजा रणजीत सिंह की विस्तारवादी महत्वकांक्षाओं से परिचित हो चुके थे | इसलिए उन्होंने रणजीत सिंह के विजयी अभियान को रोकने के लिए रणजीत सिंह के साथ अमृतसर की संधि करने का निर्णय लिया |

पहले तो रणजीत सिंह इसके लिए राजी नहीं हुए लेकिन जब अंग्रेजों ने उन्हें सैन्य आक्रमण की धमकी दी तो वो समय की मांग को देखते हुए इसके लिए राजी हो गए |

इस संधि के तहत सतलुज नदी को उनके अधिकार क्षेत्र की पूर्वी सीमा मान लिया गया | इसके तहत वो सतलुज नदी के इस पार भारत में अपने क्षेत्र का विस्तार नहीं कर सकते थे |

लेकिन रणजीत सिंह ने दूसरी दिशा में अपने क्षेत्र का विस्तार जारी रखा |

महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु – Maharaja Ranjit Singh Death

जून 1839 में महाराजा रणजीत सिंह की बीमारी की वजह से मृत्यु हो गयी लेकिन उनका नाम इतिहास में सुनहरी अक्षरों में दर्ज हो गया | लेकिन उनकी मृत्यु के बाद छह साल के अंदर ही उनके द्वारा बनाये गए पूरे राज्य का विनाश हो गया |

Mohan

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