Major Dhyan Chand Biography in Hindi

Major Dhyan Chand Biography in Hindi – मेजर ध्यानचंद एक ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होने भारत को लगातार 3 बार ओलम्पिक गोल्ड मेडल जितवाया था | उनका जन्म दिन यानी 29 अगस्त देश में नेशनल स्पोर्ट्स डे के रूप में मनाया जाता है |

इसी दिन खेलों में अच्छा परदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को अर्जुन पुरस्कार और कोचेस को द्रोणाचार्य पुरस्कार दिए जाते हैं |

अंतर्राष्ट्रीय मैचों में 400 और अपने पूरे करियर में 1000 गोल्स करने वाले ध्यानचंद को लोग हॉकी का जादूगर भी कहते थे | कहते हैं बॉल उनकी हॉकी स्टिक के साथ इस तरह से चिपकी रहती थी कि लोगों को शक़ होता था कि कहीं उनकी हॉकी स्टिक में मैगनेट या गोंद तो नहीं लगी |

Major Dhyan Chand Biography in Hindi
Major Dhyan Chand Biography in Hindi

उन्हें हॉकी का भगवान भी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्यूंकी विएना के स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक मूर्ति लगी है जिसमें उनके चार हाथ दिखाए गये हैं और सभी हाथो में हॉकी स्टिक्स हैं |

मेजर ध्यानचंद को हॉकी का जादूगर कहा जाता था लेकिन ये प्रतिभा उनमें जन्मजात नहीं थी बल्कि कड़ी मेहनत, लगन, संघर्ष और संकल्प के दम पर उन्होने ये मुकाम हासिल किया था |

मेजर ध्यानचंद का बचपन Major Dhyan Chand Childhood

ध्यानचंद के पिता समेश्वर सिंह आर्मी में सूबेदार थे और आर्मी में होने के कारण उनका ट्रांसफर होता रहता था |

बार बार ट्रांसफर होने की वजह से ध्यानचंद की पढ़ाई बहुत डिस्टर्ब होने लगी थी, जिस कारण ध्यानचंद ने छठी क्लास में ही पढ़ाई छोड़ दी |

1922 में 16-17 साल की उम्र में ही उन्होने एक सैनिक के रूप में आर्मी ज्वाइन कर ली | आर्मी ज्वाइन करने से पहले उन्हें ना तो हॉकी खेलना आता था और ना ही हॉकी के खेल में उनकी कोई खास रूचि थी |

आर्मी में जब उन्होने दूसरे लोगों को हॉकी खेलते हुए देखा तो उनमें भी हॉकी खेलने की इच्छा जगी | ध्यानचंद हॉकी सीखने के लिए खूब मेहनत करते थे |

एक रात चाँद की रोशनी में ध्यान सिंह लगातार हॉकी की प्रैक्टिस कर रहे थे | उन्हें देखकर उनके दोस्त उन्हें चिढ़ा रहे थे पर वो किसी की परवाह किए बिना पूरी लगन से प्रैक्टिस किए जा रहे थे |

उनकी लगन को देखकर उन्हें हॉकी सिखाने वाले सूबेदार बाले तिवारी ने कहा था

‘चांद की रोशनी में जैसे मेहनत कर रहे हो. एक दिन हॉकी का चांद बनकर चमकोगे. मैं आज से तुम्हें ध्यान सिंह नहीं ‘ध्यानचंद’ कहकर पुकारूंगा’

सूबेदार बाले तिवारी ने ध्यानचंद को अच्छा खिलाड़ी बनाने के लिए उन्हें हॉकी के खेल की हर बारीकी सिखाई और ध्यानचंद भी एक अच्छे शिष्य की तरह सीखते गये |

न्यूज़ीलैण्ड में हासिल की प्रचण्ड जीत

धीरे धीरे ध्यानचंद ऐसे खिलाड़ी बन गये जिनके मुरीद पूरी दुनिया में थे | 1922 में आर्मी में भर्ती होने के बाद उन्हें सबसे पहले विदेश में खेलने का मौका 1926 में मिला |

1926 में सेना की हॉकी टीम को न्यूज़ीलैण्ड खेलने जाना था | ध्यानचंद को पता नहीं था कि उनका चयन भी टीम में हो सकता है | एक दिन अचानक उनके कमांडिंग अफसर उन्हें बुलाते हैं और बताते हैं कि तुम्हें हॉकी खेलने के लिए टीम के साथ न्यूज़ीलैण्ड जाना है |

ध्यानचंद के साथ साथ भारत की हॉकी टीम का भी ये पहला विदेशी दौरा था | न्यूज़ीलैण्ड में खेले 21 मैचों में 18 मैच भारत की टीम ने जीते और अपने पहले विदेशी दौरे में ही सबको स्तब्ध कर दिया |

भारत की टीम ने 192 गोल किए जिनमें से अकेले ध्यानचंद ने 100 गोल दाग डाले | न्यूज़ीलैण्ड से लौटने के बाद उन्हें लांस नायक के पद पर प्रमोट कर दिया गया |

इस दौरे में भारत की टीम सिर्फ़ एक मैच हारी थी और जब कर्नल जॉर्ज ने मेजर ध्यानचंद से पूछा की उनकी टीम एक मैच क्यूँ हार गई तो उनका जवाब बड़ा चौंकाने वाला था |

ध्यानचंद ने जवाब दिया था कि उनकी टीम एक मैच इसलिए हार गई क्यूंकी उन्हें लगा की उनके पीछे बाकी 10 खिलाड़ी भी हैं |

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ध्यानचंद ने जितवाए तीन ओलिंपिक गोल्ड

इसके बाद उन्होने 1928 के आम्सटरडॅम ओलंपिक्स में भारतीय टीम को हॉकी में गोल्ड दिलवाया | ये वो समय था जब भारत की हॉकी टीम का पूरी दुनिया में कोई सानी नहीं था |

इस ओलिंपिक में भारत की टीम ने डच, जर्मन, बेल्जियम, डेनमार्क, स्विट्ज़र्लॅंड और फाइनल में नीदरलैंड को 3-0 से हराकर गोल्ड मेडल जीता था |

ध्यानचंद ने 5 मैचों में 14 गोल्ड करके अपनी अलग पहचान बना ली थी और फाइनल के तीनो गोल भी ध्यानचंद के ही नाम थे | इस जीत के बाद जब भारत की टीम वापिस लौटी तो उनके स्वागत में पूरा देश उमड़ पड़ा |

बंबई के डॉकयार्ड पर मालवाहक जहाज़ों की आवाजाही 24 घंटे के लिए रोक दी गई थी | अख़बारो में उनकी हॉकी स्टिक को जादू की छड़ी और उन्हें हॉकी का जादूगर कहा जाने लगा था |

इसके बाद 1932 के लॉस आंजल्स ओलिंपिक में ध्यानचंद को सीधे चुन लिया गया जबकि उनके भाई रूप सिंह और दूसरे साथी खिलाड़ी इंटर-प्रोविज़नल टूर्नामेंट खेलकर ओलिमपिक्स में अपना स्थान सिक्योर कर पाए थे |

इस ओलिंपिक में भी भारत ने जीत हासिल की | फाइनल मैच में अमेरिका को 24-1 से हराकर भारत ने एक बार फिर गोल्ड अपने नाम कर लिया |

32 के ओलम्पिक में जीत के बाद भारत की टीम एक इंटरनॅशनल टूर पर भी गई जिसमें भारत के खिलाड़ियों ने अमेरिका, इंग्लेंड और दूसरे देशों में बहुत से मैच खेले |

ये टूर इतना शानदार था की खेले गये 37 मैचों में भारत ने 34 में जीत हासिल की और कुल 338 गोल किए | इन 338 गोल्स में ध्यानचंद के नाम 133 गोल्स थे |

साल 1934 में ध्यानचंद भारतीय हॉकी टीम के कप्तान बना दिए गये | इसके बाद 1936 के बर्लिन ओलिंपिक में भी ध्यानचंद ने ही टीम की कमान संभाली और भारत को एक ओर गोल्ड दिलाया |

हिटलर भी बन गया था ध्यानचंद का कायल

इस बार के ओलिमपिक्स में भारत ने फाइनल मुकाबला जर्मनी से खेला | जर्मनी पर हिट्लर नाम के तानाशाह का राज था | हिट्लर खुद फाइनल मैच देखने के लिए मैदान पर मौजूद था |

लेकिन इस फाइनल मुक़ाबले में जैसे ही ध्यानचंद एंड टीम ने जर्मनी को पटखनी देनी शुरू की तो कुछ ही देर में हिट्लर मैच छोड़कर चला गया |

उस दिन बर्लिन के स्टेडियम में 40000 लोग मैच देख रहे थे जिनमें बरोदा के महाराजा, भोपाल की बेगम और हिट्लर के बड़े अधिकारी भी मौजूद थे |

हाफ टाइम तक भारत जर्मनी से सिर्फ़ एक गोल आगे था | इसके बाद ध्यानचंद ने अपने जूते उतार दिए और नंगे पाँव मैदान में आ गये |

भारत ने ये मुकाबला 8-1 से जीत लिया था |

हिट्लर ने भारत जर्मनी का पूरा मैच नहीं देखा लेकिन ध्यानचंद की जादूगरी के चर्चे हर तरफ हो रहे थे | हिट्लर तक भी ध्यानचंद की जबरदस्त खेल प्रतिभा की ख़बरे पहुँची | हिट्लर ओलिंपिक खेलों के समापन के दिन ध्यानचंद से मिला |

कहते हैं की हिट्लर ध्यानचंद से इतना इंप्रेस हो चुका था की उसने ध्यानचंद को अपनी सेना में कर्नल बनने का ऑफर दे दिया था |

ध्यानचंद एक सच्चे देशभक्त थे उन्होने तुरंत हिट्लर का वो ऑफर ठुकरा दिया | ये वो समय था जब भारत अँग्रेज़ों के अधीन था | टीम को यूनियन जैक के झंडे तले ही खेलना होता था |

ध्यानचंद की जादूगरी से सम्मोहित हो जाते थे लोग

लेकिन भारतीय हॉकी टीम की हालत इतनी खराब थी की विदेशों में खेलने जाने के लिए उनके पास पैसा ही नहीं होते थे | ओलिमपिक्स से पहले भी एक बार भारतीय हॉकी टीम जर्मनी से खेलने के लिए गई थी | तब जर्मनी ने टीम का पूरा खर्च उठाया था |

इससे पहले 1928 के ओलिंपिक में बंगाल हॉकी संघ, 1932 में पंजाब नेशनल बैंक और बंगाल हॉकी संघ ने हॉकी टीम की पैसों से मदद की थी |

खैर ध्यानचंद के खेल को देखकर लोग बहुत हैरान होते थे | बहुत बार उनकी हॉकी स्टिक्स को तोड़कर देखा गया की कहीं उसमें चुंबक तो नहीं और कई बार उनकी हॉकी स्टिक्स बदल कर भी देखी गई |

लेकिन फिर भी उनका खेल वैसा ही रहता था क्यूंकी जादू उनकी छड़ी में नहीं बल्कि उनके हाथों में था | मैदान में बैठे दर्शक भी ध्यानचंद की इस जादूगरी से सम्मोहित हो जाते थे |

एक बार मेजर ध्यानचंद के खेल को देखकर एक लड़की उनके पास आकर बोली ‘तुम किसी एजेंल की तरह लगते हो, क्या मैं तुम्हें किस कर सकती हूं?’

ये सुनकर ध्यानचंद शरमा गये और बोले “माफ़ कीजिए मैं शादीशुदा हूँ

जहाँ एक तरफ लोग उनकी प्रतिभा को देखकर हैरान होते थे वहीं कुछ लोग उन्हें तरह तरह के चैलेंज भी देते रहते थे |

जैसे की एक अंग्रेज अधिकारी की बीवी ने उन्हें छतरी से खेलने का चैलेंज दिया | ध्यानचंद ने इस चैलेंज को एक्सेप्ट किया और पूरा भी करके दिखाया |

चेस्बोर्ड की तरफ माप लेते थे मैदान

आजादी के बाद पाकिस्तान की हॉकी टीम के कप्तान और उनके साथ 1936 के ओलिंपिक में खेलने वाले आई एन एस दारा ने कहा था की

“ध्यान तेज गति से नहीं दौड़ते थे बल्कि वो धीमा ही दौड़ा करते थे. पर उनके पास गैप को पहचानने की अद्भुत क्षमता थी”

वो ये भी बताते हैं की डी में घुसने के बाद वो इतनी तेज़ी और ताक़त से शॉट लगते थे की दुनिया के बेस्ट गोलकीपर के लिए भी कोई मौका नहीं रहता था |

दो बार ओलिंपिक चॅंपियन केशव दत्त बताते हैं की

“वो इस तरह से हॉकी के मैदान को देख सकते थे जैसे एक शतरंज का खिलाड़ी चेस बोर्ड को देखता है
उन्हें बिना देखे ही पता होता था की मैदान के किस हिस्से में उनके टीम के खिलाड़ी और विरोधी खिलाड़ी मूव कर रहे हैं”

उनके मैदान को मापने की इस क्षमता का पता इस बात से भी चलता है की

एक बार उन्होने एक शॉट मारा और बॉल पोल से टकरा गई | उन्होने रेफ़री से कहा की गोल पोस्ट की चौड़ाई कम है | जब गोल पोस्ट की चौड़ाई मापी गई तो सभी हैरान रह गये क्यूंकी सच में गोल पोस्ट की चौड़ाई कम थी |

क्रिकेट के सबसे बड़े खिलाड़ी सर ब्रैडमन ने एक बार उन्हें हॉकी खेलते देखा था |

जिसके बाद उन्होने कहा था की ध्यानचंद ऐसे गोल करते हैं जैसे क्रिकेट में रन बनते हैं.

अपने आख़िरी दीनो में ध्यानचंद लोगो और सरकार की बेरूख़ी से चिड़चिड़े हो गये थे लेकिन खेलने के समय वो बहुत शांत स्वाभाव के हुआ करते थे |

एक बार सैपर्स एण्ड माइनर्स के खिलाफ मैच में उन्होने विरोधी टीम में खलबली मचा दी थी | जिससे विरोधी टीम के खिलाड़ी संतुलन खो बैठे और अचानक ध्यानचंद की नाक पर चोट मार दी |

फर्स्ट ऐड के बाद जब ध्यानचंद मैदान में लौटे तो उन्हें चोट मरने खिलाड़ी की पीठ थपथपाते हुए मुस्काराकार कहा -“सावधानी से खेलो ताकि मुझे दोबारा चोट न लगे।”

लग रहा था की वो उस खिलाड़ी से बदला लेंगे लेकिन उनका बदला लेने का तरीका बड़ा अलग था. उन्होने एक साथ 6 गोल कर दिए और अपनी भाषा में जवाब दिया |

ध्यानचंद को मिले अवार्ड्स

1948 में उन्होने 42 साल की आयु में हॉकी से सन्यास ले लिए था | 1956 में उन्हें पदम भूषण पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया |

1956 में 51 वर्ष की आयु में ध्यानचंद सेना से मेजर के पद पर पहुँचकर रिटाइर्ड हुए | उनके नाम से एक डाक टिकट भी जारी की गई थी | हालाँकि मेजर ध्यानचंद अपने आख़िरी दिनों में हॉकी फेडरेशन के रवैये से खुश नहीं थे |

उनके बेटे अशोक कुमार ने भी हॉकी अफीशियल के रवैये की वजह से हॉकी से जल्दी सन्यास ले लिया था | ध्यानचंद के बाद भारत की हॉकी टीम का जादू भी ख़तम सा हो गया |

2 दिसंबर 1979 को हॉकी का ये जादुगार दुनिया को अलविदा कह गया लेकिन मेजर ध्यानचंद का मैदान पर दिखाया जादू इतिहास के पन्नो में दर्ज हो गया |

Mohan

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