सबको बराबर करने वाला : संत रविदास

भारत देश में अलग अलग समय पर बहुत  सरे महापुरुषों ने जन्म लिया है जिन्होंने पुरे विश्व को सही राह दिखाई है इसी वजह से भारत को धार्मिक संस्कृति का देश माना जाता है। और पुरे विश्व में इसे धर्म गुरु का दर्ज़ा भी प्राप्र्त है। 

बहुत सारे ऐसे सनत महात्मा थे जिनकी सुरति बचपन से ही ईश्वर में लगी  हुई थी और बहुत सारे ऐसे थे जिन्हे ठोकर खा कर या समय पा कर भगवान की वास्तविकता और सच्चाई का पता चला।  भगवान कभी भी ये नहीं देखता के उसकी उपासना करने वाला अमीर है या गरीब, वो किस जाती से संबंध रखता है या फिर समाज में उसका रुतबा कितना बड़ा या छोटा  है। भगवान सिर्फ उसकी आराधना करने वाले की आस्था को देखता है ।

sant ravidas biography in hindi
Sant Ravidas Biography in Hindi

 भारत कई सदियों तक गुलाम रहा है कभी मुग़लों ने गुलामी की कभी अंग्रेज़ों ने तो कभी इस देश में रहने वाले कुछ बड़े लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए छोटे लोगों को अपना गुलाम बनाया। परन्तु इस गुलामी में भी बहुत सारे संत महात्मा आम लोगों के लिए भगवान का रूप बनकर आये और लोगों को सही गलत का पाठ पढ़ाया आज हम ऐसी ही महान संत के बारे में जानेगे। 

संत रविदास का जन्म और बचपन

बेगम पुरा सहर को नाउ।। 
दूखु अंदोहु नहीं तिहि ठाउ।।

शारीरिक गुलामी से भी ज्यादा खतरनाक होती है मानसिक गुलामी। पुराने समय में लोग मानसिक गुलामी के शिकार थे। ऊँच नीच छूआ छूत ऊँची जाती नीची जाती इन सबमे लोग फसे हुए थे।  उस समय एक ऐसे समाज की कल्पना करना जो इन सब बिमारियों से जकड़ा हुआ न हो , किसी आम व्यक्ति के लिए कल्पना भी करना मुश्किल था। 

ऐसे ही समाज में संत रविदास जी का जन्म हुआ।  इतिहासकारों के अनुमान के मुताबिक संत रविदास का जन्म हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र शहर और दुनिया के सबसे पुराने शहर वाराणसी के पास सीर गोबर्धनगाँव में 1377 AD में हुआ। संत रविदास को बचपन में रैदास, रूहीदास नामों से भी बुलाया  जाता था। रविदास जी के जन्म को लेकर  बहुत  सारे मतभेद  हैं । कुछ मिले हुए पुराने दस्तावेजों में संत रविदास का जन्म 1450 – 1520 के बीच  हुआ भी बताया गया  है। 

संत रविदास जी के पिता जी संतोख दास जी मरे हुए जानवरों की खाल निकल कर उससे चमड़ा बनाने का काम करते थे। संत रविदास का जन्म एक निम्न कुल में होने से अक्सर इन्हे उच्च कुल के बच्चों से ताने सुनने को मिलते थे परन्तु रविदास जी एक निडर और बहादुर बालक थे। वो एक ऐसे समाज की रचना चाहते थे जिसमें इस तरह का भेदभाव न हो और हरेक कुल और जाति के लोग समानता के साथ रहे। और वो अपनी रचनाओं में भी लोगों को इसी का संदेश देते थे।

शिक्षा

विद्यालय में भी उच्च जाति के विद्यार्थी रविदास को परेशान करते थे। रविदास जी पंडित शारदा नन्द के पास शिक्षा ग्रहण करने जाया करते थे।  जब उच्च जाति वालों ने उनका पाठशाला में आना बंद किया तो शारदा नन्द जी को बहुत बुरा लगा क्योंकि वह जान चुके थे के रविदास कोई साधारण बालक नहीं है। 

शारदा नन्द जी ने रविदास को निजी तौर पर पढ़ना शुरू किया।  शारदा नन्द का  बेटा भी रविदास के साथ ही शिक्षा ग्रहण करता था। ऐसा कहा जाता है के एक बार शारदा नन्द जी का बेटा और रविदास रात को खेलने के बाद जब अपने घर गए तो रात को शारदा नन्द जी के बेटे की मृत्यु हो गयी | 

जब इस बात का पता सुबह रविदास को लगा तो वो मृत देह के पास पहुंच कर बोला उठो मित्र ये सोने का समय नहीं है हमने अपना खेल समाप्त करना है।  ऐसा सुनते ही वो बालक उठ कर बैठ गया।  जिसे देख कर सब लोग आश्चर्यचकित हो गए। 

संत रविदास का विवाह

रविदास अपने समाज के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे। उनका भगवान के प्रति अटूट विश्वास था। वो पूरा दिन राम राम गोविन्द गोविन्द करते रहते थे और विश्वास के कारण और भगवान की भक्ति के कारण उनका मन अपने पुश्तैनी काम में नहीं लग पता था | 

जिससे माता पिता बहुत परेशान रहते थे। इसी वजह से उनका विवाह छोटी उम्र में ही लोना से कर दिया था। और उनका एक पुत्र विजय दास का जन्म हुआ। घर के काम में हाथ न बता कर वो सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहते थे जिससे उनके परिवार वाले खुश नहीं थे, उनका परिवार उनके कामों में विघ्न न डालें इसलिए वो अलग रहने लग गए। 

मीरा बाई और रविदास जी का रिश्ता

मीरा बाई भक्ति कल की एक प्रसिद्ध रचनाकार हैं।  मीरा बाई एक राजघराने से संबंध रखती थी। मीरा बाई के पिता चित्तोड़ के राजा थे। मीरा बाई की माता जी की अचानक मृत्यु के बाद उनके दादा जी ने उन्हें संभाला। उनके दादा जी संत रविदास के परम् भक्त थे। जिससे इसका असर मीरा बाई पर भी होने लगा और वो भी संत रविदास की अनुयायी बन गयी। 

रविदास जी का सामाजिक प्रभाव

रविदास जी बचपन से ही एक चमत्कारी बालक थे और जैसे जैसे उनकी उम्र और तजुर्बा बढ़ता गया लोग उनके चमत्कारों और विचारों से और भी प्रभावित होते गए। एक बार उनके शिष्यों ने उनसे जिद की के वो उनके साथ गंगा स्नान के लिए चले परन्तु रविदास जी ने मना कर दिया तो कारण पूछने पर उन्होंने कहा ” मन चंगा तो कठोती में गंगा “

अर्थात अगर हमारा मन साफ है , उसमे किसी के प्रति द्वेष या ईर्ष्या या किसी तरह का लालच नहीं है।  मन पूरी तरह से भगवान को समर्पित है तो गंगा स्नान के लिए गंगा के पास जाने की जरूरत नहीं है।  अगर मन साफ है तो आपके पास पड़े बर्तन का पानी भी गंगा के समान पवित्र है और अगर हमारे मन में ही मैल है तो पवित्र  गंगा का पानी भी हमे शुद्ध नहीं कर सकता। 

एक बार जंगल के रस्ते जाते हुए एक ब्राह्मण युवक पर शेर ने हमला कर दिया तो रविदास जी ने उसकी जान बचाई जिससे वो ब्राह्मण परिवार रविदास जी के करीबी बन गया।  इस बात का पता जब राजा को लगा तो वो रविदास जी की परीक्षा लेनी चाहता था तो उसने एक दूसरे ब्राह्मण युवक को शेर के आगे भेज दिया और एक तरफ  रविदास को खड़ा कर दिया। 

जब शेर बालक के पास आया तो रविदास जी को देख कर वापिस मुड़ गया।  यह दृश्य देख कर राजा के साथ साथ बाकि लोग भी हाथ जोड़ कर रविदास जी के सामने खड़े हो गए। 

रविदास जी ब्राह्मण लोगों की तरह जनेऊ पहनते थे और तिलक करते थे जिससे उनकी बिरादरी वाले उनको बहुत रोकते थे परं तू रविदास जी कहते थे के भगवान ने सबको एक जैसा बनाया है।  ये जाती धर्म तो हमने धरती पर आ के बनाया है।  हम सब एक ही भगवान के बनाये हुए है जिससे हर किसी को हक़ है के वो कुछ भी कर सकते हैं , जो मन आये पहन सकते हैं , जब भगवान उन्हें स्वयं आकर जनेऊ और तिलक से रोकेगा तो वो रुकेंगे। 

उनकी यही बातें राजा तक पहुंच जाती है तो उन्हें सभा में बुलाया जाता है। वो अपनी छाती चीर कर दिखते है के देखिये

ब्राह्मण और शूद्र के पास लाल रंग का रक्त है और एक समान ही हृदय और हड्डियां है तो हम अलग कैसे हुए ?

और रही बात जनेऊ की तो वो चार जनेऊ बना देते है, जिससे सभा में बैठे सभी लोग शर्मिंदा महसूस करते है और समझ जाते हैं के रविदास सत्य कह रहे हैं।  ये जाती धर्म तो बस इंसानों द्वारा बनाया गया है।  अंदर से तो हम सब एक ही हैं। 

पिता जी की मृत्यु

उस समय में समाज में जाति प्रथा इतनी ज्यादा क्रूर तरीके से थी कि छोटी जाति वालों को गंगा के तट पर जाने की अनुमति नहीं थी। जब रविदास जी के पिता जी की मृत्यु हुई तो उनकी इच्छा थी की वो पिता जी की अस्थियां बाकि लोगों की तरह गंगा जी में विसर्जित करें ताकि उनके पिता जी को स्वर्ग की प्राप्ति हो | 

परन्तु ब्राह्मण इससे खुश नहीं थे वो मानते थे के गंगा जी बहुत पवित्र है और एक शूद्र की अस्थियां गंगा जी में जाने से ये अपवित्र हो जाएगी।

 इस बात का रविदास जी को बहुत बुरा लगा और वो भगवान जी से प्राथना करने लगे।  उस समय इतना तेज़ तूफ़ान आया के गंगा जी की धरा उलटी बहने लगी और लहरें उछल उछल कर तट तक आने लगी और एक लहर उन अस्थियों को बहा कर ले गयी। और ऐसा भी मन जाता है के उस तूफ़ान के बाद से गंगा उलटी दिशा में बहने लग गयी थी। 

संत रविदास जी की रचनाएँ

रविदास जी ने बहुत सारी रचनाएं लिखी जिनमे से दोहे, साखियाँ बहुत प्रसिद्ध हैं। उनकी रचनाएँ ज्यादातर सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहेब में दर्ज़ हैं।  उनके बहुत सारे पद, भक्ति गीत लगभग 41 छंद है जिन्हे गुरु अर्जुनदेव जी ने एकत्रित करके गुरु ग्रंथ साहेब में दर्ज़ किया था। 

गुरु ग्रंथ साहेब में दर्ज़ उनके लेखन में 

“राग – सिरी, गौरी, आसा, गुजरी, सोरठ, धनसारी, जैतसारी, सुही, बिलावल, गौंड, रामकली, मारू, केदार, भैरु, बसंत, और मल्हार. अदि हैं जिन्हे आज भी गुरुद्वारों में बहुत ही श्रद्धा से पढ़ा और सिमरन किया जाता है। 

रविदास जी एक ऐसे समाज को देखना चाहते थे जिसमे कोई जाती बंधन न हो।  हरेक व्यक्ति को समान अधिकार हो।  इसी संदर्भ में वो लिखते है  

बेगम पुरा सहर को नाउ।। दूखु अंदोहु नहीं तिहि ठाउ।। 
नां तसवीस खिराजु न मालु।। खउफु न खता न तरसु जवालु।।1।।
अब मोहि खूब वतन गह पाई।। ऊहां खैरि सदा मेरे भाई ।।1।। रहाउ।।
काइमु दाइमु सदा पातिसाही।। दोम न सेम एक सो आही।।
आबादानु सदा मसहूर।। ऊहां गनी बसहि मामूर।।2।।
तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै।। महरम महल न को अटकावै।।
कहि रविदास खलास चमारा।। जो हम सहरी सु मीतु हमारा।।3।। (पन्ना 345)

अर्थात बेगमपुरा वो शहर है जिसमे रहने वाले लोग साफ दिल के हैं।  उनके अंदर किसी तरह की मैल नहीं है। वो जाती पाती से मुक्त है और एक भगवान में आस्था रखते हैं।  उन्हें कोई लालच नहीं है , कोई अमीर नहीं है कोई गरीब नहीं है जैसे भगवान ने इंसान को बनाया है वह पर इंसान बिलकुल वैसा ही है।  अगर आप भी उस जगह रहते हो तो आप हमारे मित्र हो । 

संत रविदास जी और बाबर

बाबर वो पहला मुग़ल शाशक था जिसने भारत पर कब्ज़ा करके यह पर मुग़ल शासन की नींव रखी थी।  वो बहुत की क्रूर और दुष्ट राजा था।  उसके रस्ते में जो भी कोई अत वो सबको मार देता और जो भी मिलता उसे हथया लेता था। उसकी क्रूरता के चर्चे दूर दूर तक थे। 

परन्तु बाबर संत रविदास के चमत्कारों और विचारों से बहुत प्रभावित था। बाबर एक बार संत रविदास से मिलना चाहता था और उस दैवीय इंसान के दर्शन करना चाहता था जिसने समाज में फैली जाती पाती और ऊँच नीच नाम की बीमारी को खत्म करने का निर्णय लिया था। 

संत रविदास को जब यह पता चला के दुष्ट बाबर उनसे मिलना चाहता है तो पहले तो उन्होंने मना कर दिया पर बाद में वो उनसे मिलने के लिए मन गए। 

जब बाबर रविदास जी के पास आया तो रविदास जी ने उन्हें आशीर्वाद देने की बजाय उन्हें श्राप दे दिए और बाद दुआ देने लगे। और बाबर को इंसानियत का पाठ पढ़ने लगे।  उन्होंने बाबर को बोला के वो गिनती करके ये भी नहीं बता सकता के अब तक उसने कितने मासूमों को सिर्फ अपने लिए अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए मार दिया है।  

रविदास जी ने बाबर को सही ज्ञान दिया , सही रस्ते पर चलने की प्रेरणा दी जिससे बाबर जैसा कुकर्मी राजा संत रविदास के चरणों में  गिर गया और उनका पक्का अनुयायी बन गया। 

संत रविदास जी की मृत्यु

रविदास जी के चर्चे दूर दूर तक फ़ैल गए थे। बहुत सारी गिनती में लोग उनके भक्त बन रहे थे और उनके द्वारा बताये मार्ग पर चल रहे थे।  उनकी इसी प्रसिद्धि को देख कर कुछ  ब्राह्मण राजनेता खुश नहीं थे क्योकि लोगों ने उनकी बातों को मानना कम कर दिया था जिससे उनकी इज़्ज़त समाज में कम हो गयी थी।  तो सब लोग मिल कर रविदास जी को एक सभा में बुलाते है। 

यह सभा को गांव से दूर रखते हैं और रविदास जी को अकेले आने को कहते हैं।  रविदास जी को उनके षड्यंत्र का पता पहले ही चल जाता है।  वो सभा में 

तो जाते हैं पर अपने चमत्कार से।  ब्राह्मणों के षड्यंत्र में उनका ही एक साथी भल्ला नाथ मारा जाता है।  रविदास जी अपनी जगह पर खड़े होकर शंख बजाते हैं जिससे सबको पता चल जाता है के यह कोई साधारण पुरुष नहीं है बल्कि भगवान का ही रूप है। 

रविदास जी की मृत्यु के बारे में कोई ठोस प्रमाण नहीं है पर ऐसा मन जाता है के वो 126 साल की उम्र भोग कर 1540 AD  के लगभग अपना देह त्याग करके हमेशा के लिए भगवान में लीन हो गए थे। 

रविदास जी भक्तिकाल के कवियों में रचनाकारों में एक विशेष स्थान रखते हैं।  उनकी शिक्षाएं क्रांतिकारी थी जो एक निम्न जाति के लोगों को उच्च जाति वालों के साथ समाज में बराबरी हासिल करने के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती थी। 

वो एक भगवान को मानते और यह कहते थे के अंदर से हम एक ही हैं, ऊपर का जो विभाजन है वो हमने खुद किया है भगवान ने नहीं।

उनकी रचनाओं को आज भी एक मार्गदर्शक मन जाता है जो हमे एक सभ्य समाज का रास्ता दिखती है और ऐसे समाज की तरफ बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है जो किसी भी तरह के द्वेष से मुक्त हो। हम उस समाज में खुल कर जी सके और भगवान का सिमरन करते करते उसे में लीन हो जाये।

Rahul Sharma

हमारा नाम है राहुल,अपने सुना ही होगा। रहने वाले हैं पटियाला के। नाजायज़ व्हट्सऐप्प शेयर करने की उम्र में, कलम और कीबोर्ड से खेल रहे हैं। लिखने पर सरकार कोई टैक्स नहीं लगाती है, शौक़ सिर्फ़ कलाकारी का रहा है, जिसे हम समय-समय पर व्यंग्य, आर्टिकल, बायोग्राफीज़ इत्यादि के ज़रिए पूरा कर लेते हैं | हमारी प्रेरणा आरक्षित नहीं है। कोई भी सजीव निर्जीव हमें प्रेरित कर सकती है। जीवन में यही सुख है के दिमाग काबू में है और साँसे चल रही है, बाकी आज कल का ज़माना तो पता ही है |

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