शून्य की व्याख्या करने वाला विद्वान : श्रीधराचार्य

Sridharacharya Biography in Hindi – गणित विषय बहुत ही दिलचस्प विषय है। हरेक विद्यार्थी गणित को पढ़ना समझना पसंद नहीं करता। ज्यादातर विद्यार्थी गणित को एक उबाऊ विषय मानते हैं और उनके मुताबिक गणित में आगे जाकर उनका कोई भविष्य नहीं बन सकता।

पर उन विद्यार्थिओं को इस बात का ज्ञान नहीं है या बहुत काम है के पूरी दुनिया में जो भी कार्य हो रहा है उसमे गणित कही न कही भागीदारी रखता है।   पूरी दुनिया में गणित के कितने ही महान विद्वान हुए हैं जिन्होंने गणित के ऐसे ऐसे फार्मूला को निकला है, जो सुई बनाने से लेकर ब्रह्माण्ड के विकास तक की पहेली को हल करने में सक्षम है। 

sridharacharya biography in hindi
Sridharacharya Biography in Hindi

हमारे देश भारत में ऐसे बहुत सरे विद्वान हुए हैं जिन्होंने पूरी दुनिया के लिए गणित के मायने ही बदल दिए। पूरी दुनिया को बताया के भारतीय विद्वान असल में पूरी दुनिया के गुरु हैं। आर्यभट्ट ने शुन्य की खोज की और पूरी दुनिया को गणित खा से शुरू होता है वो बताया। पर हम बात आर्यभट्ट की नहीं कर रहे। 

हम बात कर रहे है एक ऐसे विद्वान की जिनके द्वारा सैकंडो साल पहले दिए हुए फार्मूला को आज भी बड़े बड़े गणितज्ञ इस्तेमाल कर रहे है और उनको सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं।  एक ऐसे भारतीय गणितज्ञ जिनके बारे में ज्यादातर भारतीय जानते ही नहीं। हम बात कर रहे है गणित के ज्ञाता श्रीधराचार्य जी की। 

श्रीधराचार्य का जीवन परिचय Sridharacharya Biography In Hindi

जन्म और बचपन

श्रीधराचार्य जी के जन्म को लेकर अलग अलग इतिहासकारों के अलग अलग मतभेद है पर कोई भी किसी सटीक निर्णय पर नहीं पहुंच पाया।  ऐसा मन जाता है की इनका जीवनकाल 870 ई से 930 तक था। 

इनके पिता जी का नाम बलदेवाचार्य  था। वो कन्नड़ भाषा और संस्कृत भाषा के विद्वान थे और पुरे इलाके में उनकी विद्मता के चर्चे थे।  कुछ इतिहासकार इनके पिता जी का नाम वासुदेव शर्मा भी बताते है।  इनकी माता जी का नाम चोक्का था और वो भी संस्कृत भाषा की विद्वान थी। 

माता पिता दोनों के ही विद्वान पंडित होने का असर श्रीधराचार्य जी पर दिखा और वो भी जल्दी ही कन्नड़ और संस्कृत भाषा को सीख गए थे।  कुछ इतिहासकार इनका जन्म बंगाल के हुगली में हुआ और दूसरी तरफ ये भी कहते हैं के इनका जन्म दक्षिण भारत के कर्नाटका में हुआ। 

श्रीधर जी बचपन से शैव परम्परा में विश्वास रखते थे किन्तु समय बदलने के साथ उनके ऊपर जान परम्परा का प्रभाव पड़ने लगा और वो जैनमतानुयाई बन गए 

रचनाएं

श्रीधर जी ने त्रिशतिका नाम की पुस्तक की रचना की। ऐसा माना जाता है के इस पुस्तक की रचना उन्होंने 913 ई में की थी और इसमें कुछ 300 श्लोक हैं। ऐसा कहा जाता है की ये किताब पाटी गणित से संबंधित है  और इन्समे पाटी गणित के इलावा कुछ अन्य श्रेणियों जैसे श्रेणी व्यवहार , छाया व्यवहार अदि पर चर्चा की गयी है।  

श्रीधर जी को पहचान उनके गणित में किये गए एक अमूल्य अविष्कार के लिए मिली।  उन्होंने शुन्य की व्याख्या की।  आखिर शुन्य है क्या ?कैसे काम करता है और इससे क्या क्या काम हो सकते है ? 

उन्होंने बताया के यदि किसी संख्या में शून्य जोड़ा जाता है तो योगफल उस संख्या के बराबर होता है; यदि किसी संख्या से शून्य घटाया जाता है तो परिणाम उस संख्या के बराबर ही होता है; यदि शून्य को किसी भी संख्या से गुणा किया जाता है तो गुणनफल शून्य ही होगा।

उदाहरण के तौर पर :

1+0=1

1-0=1

1*0=०

किसी संख्या को भिन्न (fraction) द्वारा भाजित करने के लिये उन्होने बताया है कि उस संख्या में उस भिन्न के व्युत्क्रम (reciprocal) से गुणा कर देना चाहिये।

इसके इलावा उन्होंने गोले के आयतन का सूत्र भी दिया और उसकी व्याख्या भी की। 

गोलव्यासघनार्धं स्वाष्टादशभागसंयुतं गणितम्।

 ( गोल व्यास घन अर्धं स्व अष्टादश भाग संयुतं गणितम् )

अर्थात V = d3/2 + (d3/2) /18 = 19 d3/36

गोले के आयतन π d3 / 6 से इसकी तुलना करने पर पता चलता है कि उन्होने पाई के स्थान पर 19/6 लिया है।

श्रीधर जी ने बीज गणित यानि ALGEBRA  के बहुत सारे व्यावहारिक अनुप्रयोगों  बहुत कुछ लिखा था जिसे आज भी बच्चों को पढ़ाया जाता है। 

उन्होंने अंकगणित (अरिथमेटिक )  को बीजगणित ( ALGEBRA ) से भिन्न किया और दोनों के अंतर को समझाया। के कैसे ये दोनों श्रीनियन अलग अलग काम करती हैं। 

उन्होंने बीज गणित को हल करने के लिए श्लोक भी लिखे  

चतुराहतवर्गसमै रुपैः पक्षद्वयं गुणयेत.

अव्यक्तवर्गरुयैर्युक्तौ पक्षौ ततो मूलम्‌.

विश्व के पहले गणितज्ञ और भारत के सबसे महान विद्वान आर्यभट्ट ने शून्य की खोज की थी।  उन्होंने दशमलव के दस अंकों तक के मान की गणना की थी।  श्रीधर जी ने इसी कार्य को आगे बढ़ाया और उन्होंने दशमलव से आगे 18 अंको तक के मान की गणना की। 

इसके इलावा इन्होने बहुत सारी और भी रचनाएं की :

  • त्रिशतिका
  • पाटीगणित सार
  • पाटीगणित
  • नवशान्ति 
  • बीजगणित 
  • बृहत्पाटि

अदि। 

इन्होने अपने एक सूत्र की रचना की जिसे द्विघाती सूत्र या श्रीधराचार्य सूत्र कहा जाता है।    

इस सूत्र का प्रयोग  द्विघात समीकरण  हल करने के लिए किया जाता है और इसका इस्तेमाल अदि काल से ही किया जाता है। यह सूत्र इस प्रकार है 

ax^2+bx+c = 0 

श्रीधर जी ने केवल भारतीय शिक्षा संस्थानों ही नहीं बल्कि विदेशी शिक्षा संस्थानों को भी गणित के ऐसे ऐसे समीकरण और फार्मूला दिए हैं जो आज भी विद्यालयों में पढ़ाये जाते हैं और विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी उनपर रिसर्च करते हैं और उन समीकरणों को और बारीकी से समझने की कोशिश करते हैं और लगातार यही प्रयास करते हैं के उनके द्वारा बनाई समीकरणों से हम क्या कोई बड़े रहस्य की खोज कर पाते हैं ?

आज श्रीधर जी का नाम बहुत कम लोग जानते हैं , उनसे वही  लोग परिचित है जो गणित को पढ़ते हैं और उसपे रिसर्च करते हैं।  एक ऐसे विद्वान जिन्होंने शून्य की परिभाषा दी , जिन्होंने अंकगणित और बीजगणित को भिन्न भिन्न किया।  ऐसे महान विद्वान के बारे में जानना हमारे लिए अति जरूरी है। क्योकि अगर हम इन जैसे विद्वानों के बारे में नहीं जानेगे तो हमारी आने वाली पीढ़ी इन विद्वानों को भूल जाएगी और हमारी संस्कृति और साहित्य के बारे में और बेहतर तरिके से नहीं जान पायेगी। 

गणित विषय में दिए गए इनके योगदान के लिए हम हमेशा ऋणी रहेंगे। 

Rahul Sharma

हमारा नाम है राहुल,अपने सुना ही होगा। रहने वाले हैं पटियाला के। नाजायज़ व्हट्सऐप्प शेयर करने की उम्र में, कलम और कीबोर्ड से खेल रहे हैं। लिखने पर सरकार कोई टैक्स नहीं लगाती है, शौक़ सिर्फ़ कलाकारी का रहा है, जिसे हम समय-समय पर व्यंग्य, आर्टिकल, बायोग्राफीज़ इत्यादि के ज़रिए पूरा कर लेते हैं | हमारी प्रेरणा आरक्षित नहीं है। कोई भी सजीव निर्जीव हमें प्रेरित कर सकती है। जीवन में यही सुख है के दिमाग काबू में है और साँसे चल रही है, बाकी आज कल का ज़माना तो पता ही है |

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