द मैन हु नो इन्फिनिटी : श्रीनिवास रामानुजन

Srinivasa Ramanujan Biography in Hindi – भारत की मिट्टी सच में बहुत कमाल की है , यह पर जिन  विद्वानों ने जन्म लिया है उनका मुकाबला दुनिया में किसी भी देश के ज्ञानी भी नहीं कर सकते। भारत में पुरातन समय में शिक्षा, अभ्यास और अध्यापकों का पर्याप्त मात्रा में न होने से भी विद्वानों ने अपने दम पर पढ़ाई की और दुनिया में एक मिसाल कायम की। 

सहूलतों के आभाव में भी उन्होंने ऐसे ऐसे कार्य और खोजें कर दी जिसने पूरी दुनिया को हैरानी में डाल दिया और भारत को विश्वगुरु साबित कर दिया क्योकि भारत में पैदा होने वाले विद्वानों का मुकाबला कहीं और नहीं।

आप में से बहुत सारे पाठकों ने आर्यभट्ट, चाणक्य जैसे विद्वानों का नाम सुना होगा पर बहुत सारे पाठक ऐसे भी हैं जिन्होंने श्रीनिवास रामानुजन का नाम भी सुना होगा।  परन्तु जिन्होंने श्रीनिवास रामानुजन का नाम नहीं सुना आज हम उनके लिए रामानुजन जी के बारे में बहुत सारी जानकारी लेकर आये हैं। 

रामानुजन एक बहुत विद्वान गणितज्ञ थे। खा जाता है के उनको सपनो में गणित की समीकरणें आती थी रात को सपने में एक देवी आकर उन्हें गणित की समीकरणें बताती  थी और दिन में वो उन्ही समीकरणों को हल किया करते थे।  वो गणित के ऐसे विद्वान थे जिन्होंने बहुत कम उम्र में ही वो मुकाम हासिल कर लिया था जिसके लिए लोगों को कई दशकों का समय लग जाता है।  

आज हम इसी महान गणितज्ञ के जीवन के बारे में जानेंगे।

श्रीनिवास रामानुजन का जन्म और बचपन Srinivasa Ramanujan Birth And Childhood

रामानुजन का पूरा नाम श्रीनिवास आयंगर रामानुजन था।  उनका जन्म तमिलनाडु राज्य के कोयंबटूर शहर के एक छोटे से गांव इरोड में 22 दिसम्बर 1887  को हुआ था।  इनका जन्म एक परंम्परिक हिन्दू ब्राह्मण परिवार में हुआ था।  इनके पिता जी एक छोटी सी साड़ी की दुकान में काम करते थे वो वहाँ पर मुनीम का काम करते थे और इनकी माता जी गृहणी होने के साथ साथ मंदिर में गण भी गति थी और उनका भगवान पर विश्वास बहुत अटूट था।

रामानुजन कोई साधारण बालक नहीं था।  वो दूसरे बालकों से अलग था।  झा दूसरे बच्चों का विकास उनकी उम्र के हिसाब से ठीक था वहीं दूसरी तरफ रामानुजन 3 साल की उम्र तक बोलना भी नहीं सीखे थे। उनकी इस बीमारी को लेकर माता पिता को बहुत चिंता थी।  दूसरे बच्चे 3 साल की उम्र में पढ़ाई शुरू कर देते हैं परन्तु जब रामानुजन 5 वर्ष का हुआ तब इनका दाखिला स्कूल में करवाया क्योंकि वो ठीक से बोल नहीं पाते थे। 

रामानुजन का मन पढ़ाई में नहीं लगता था।  वो हमेशा गणित की ही पढ़ाई किया करते थे।  उनके माता पिता उन्हें दूसरे विषय भी पढ़ने को बोलते थे पर उनका मन नहीं लग पता था। 

10 वर्ष की आयु में उन्होंने प्राइमरी परीक्षा में सबसे अधिक अंक प्राप्त किया और जिससे उनके माता पिता की ख़ुशी का ठिकाना न रहा और उन्हें यह उम्मीद हो गयी के रामानुजन दूसरे विषयों को भी पढ़ने लग गया है।  उनकी शिक्षा को जारी रखने के लिए उनका दाखिला टाउनहाल स्कूल में करवाया गया। 

रामानुजन एक नरम स्वाभाव के लड़के थे। किसी से भी ज्यादा बात नहीं करते थे और  सबसे बहुत ही सौम्य व्यवहार करते थे।  स्कूल के सभी विद्यार्थी और अध्यापक रामानुजन के इसी व्यवहार को बहुत पसंद करते थे। और वो कुछ ही समय में सभी अध्यापकों के चाहते बन गए थे। 

रामानुजन का मन गणित में ज्यादा लगता था जिस वजह से उन्होंने स्कूल में ही कॉलेज स्तर का गणित पढ़ लिया था और इस बात से उनके अध्यापक बहुत प्रभावित हुए और उन्हें और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। 

स्कूल में गणित और अंग्रेजी में उनका मुकाबला कोई और विद्यार्थी नहीं कर पता था।  गणित और अंग्रेजी में अबसे अधिक नंबर लेने की वजह से उन्हें छात्रवृति मिली जिसने रामानुजन को कॉलेज की पढ़ाई करने में बहुत मदद की।  और उनके लिए कॉलेज में दाखिला लेना और भी आसान हो गया। 

रामानुजन को गणित सबसे ज्यादा पसंद था।  वो गणित में एक दम खो गए थे और वो किसी और विषय पर ध्यान नहीं दे रहे थे।  और जिसके चलते वो 12 वीं कक्षा में सभी विषयों में फेल हो गए केवल गणित में वो सबसे अधिक नंबर लेकर पास हुए। 

12 वीं कक्षा में फेल  होने से उनका दाखिला उच्च कॉलेज में न हो पाया। जिससे वो बहुत उदास हो गए। क्योंकि फेल होने से उन्हें मिलने वाली छात्रवृति

बंद हो गयी जिससे उनके घर की आर्थिक हालत बहुत जर्जरा गयी। पिता जी के पास भी ज्यादा कमाई न होने के कारण घर के हालत और भी ज्यादा बिगड़ गए। 

घर के हालातों को सुधरने के लिए रामानुजन ने बहुत कोशिश की। उन्होंने दूसरे बच्चों को गणित की और अकाउंटस विषयों की पढ़ाई करवाना शुरू किया जिससे उनके पास कुछ पैसे आने शुरू हुए और उनकी आर्थिक हालत कुछ स्थिर हुई। 

दूसरे बच्चों को पढ़ाने के साथ साथ  वो  खुद भी अपनी पढ़ाई जारी रखते थे और 12 वीं की पढाई जारी रखते हुए उन्होंने फिर से परीक्षा दी और एक बार फिर से उनके गणितप्रेम ने उनको बाकी सभी विषयों में फेल करवा दिया और एक बार वो फिर से केवल गणित में पास हुए और बाकी विषयों में फेल। जिससे वो पूरी तरह टूट गए और उन्होंने अपनी पढ़ाई वहीं पर रोक दी। 

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संघर्ष भरा जीवन

रामानुजन का जीवन बहुत संघर्ष भरा था।  उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया। बारहवीं में फेल होने के बाद वो एक दम टूट गए थे और कुछ समय तक बिलकुल ही अलग रहे।  परिवार की आर्थिक हालत भी ठीक न होने की वजह से उन्होंने सब काम छोड़ कर पैसे कमाने की सोची और फिर से दूसरे बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। बच्चों को पढ़ाने से जो पैसे मिलते थे उतने  में घर का खर्च उठाना बहुत ज्यादा मुश्किल था।  

पहले समय में कम उम्र में विवाह करने की रीत भारत में बहुत  प्रचलित थी और इसी रीत के चलते रामानुजन का विवाह  1908 में जानकी से कर दिया। विवाह भी एक बहुत बड़ी जिम्मेवारी होती है। विवाह के बाद जिम्मेवारी सो गुना बढ़ जाती है। 

रामानुजन में इन जिम्मेवारीओं  को पूरा करने के लिए मद्रास शहर का रुख किया और वो वहां जाकर नौकरी ढूंढने लगे।  एक कम पढ़े लिखे नौजवान के लिए नौकरी ढूँढना बहुत मुश्किल था।  बाहरवीं में पास न होने की वजह से उन्हें कहीं नौकरी न मिली।  बिना पैसे के , बिना खाये पिए वो वहाँ कई दिन रुके और उनकी तबियत भी वहां खराब होने लग गयी जिसके बाद वो वापिस अपने गांव आ गए। 

परिवार की हालत सुधरने और अपने गणित के जज़्बे को बरकरार रखने के लिए वो एक बार फिर से मद्रास चले गए और इस बार दृढ़ निश्चय किया के बिना किसी कामयाबी के वापिस नहीं आना है।  उन्होंने फैसला किया के नौकरी हासिल करने के लिए वो बजाय किसी डिग्री के , अपनी गणित की क़ाबिलियत को दिखाएगें। 

मद्रास में नौकरी ढूंढते ढूंढते अचानक उनकी मुलाकात वहाँ के  डिप्टी कलेक्टर श्री वी. रामास्वामी अय्यर जि से हुई जो गणित के एक प्रचंड विद्वान थे।  उन्होंने रामानुजन के गणित के प्रति प्रेम को देखा और उनकी क़ाबिलियत को पहचान कर उन्हें 25 रुपए महीना छात्रवृति दी और यही रहने के लिए कहा।  रामानुजन 1 साल तक वहाँ रहे। 

काम करने के साथ साथ वो गणित पर भी ध्यान देते थे और अपनी शोध जारी रखते थे।  यही 1 साल के अंदर ही उन्होंने अपनी पहली रचना “बरनौली संख्याओं के कुछ गुण” को  “जर्नल ऑफ इंडियन मैथेमेटिकल सोसाइटी”  छपवाया जिसने सबका ध्यान रामानुजन की तरफ कर दिया।  

इसके बाद उन्होंने वही के ही ” मद्रास पोर्ट ट्रस्ट ” में नौकरी हासिल की, इस नौकरी में सबसे ज्यादा फायदा उन्हें ये हुआ के उन्हें गणित के लिए बहुत सारा समय मिल जाता था।  वो अपनी कल्पना शक्ति से हर रोज नए से नए रिसर्च पत्र और सूत्र लिखते थे।  ऐसा कहा जाता है के देवी सरसवती रामानुजन को सपने में आकर गणित की समिकरणें और सूत्र बताती थी जिसे रामानुजन स्लेट पर लिख लिया करते थे और सुबह उठ कर उन्हें हल करने की कोशिश किया करते थे। 

रामानुजन का सुनहरी दौर

रामानुजन एक बहुत प्रतिभाशाली युवक थे।  गणित की उनकी प्रतिभा कोई आम इंसान नहीं समझ पता था।  वो गणित की अपनी जानकारी को पूरी दुनिया तक पहुंचना चाहते थे जिसके लिए वो हर संभव कोशिश कर रहे थे। परन्तु उस समय देश अंग्रेज़ों का गुलाम था और किसी भी भारतीय का अपनी प्रतिभा को पेश करना बहुत मुश्किल था।

अपनी प्रतिभा को दिखने के लिए उनको किसी अंग्रेजी प्रोफेसर की मदद की जरूरत थी।  उनके बहुत सारे मित्रों ने उनकी मदद की और उनके शोध पत्रों को प्रोफेसर शेषू अय्यर को दिखाने का सुझाव दिया।  जब शेषु अय्यर जी ने उनके शोध पत्र देखे तो उनको प्रोफेसर हार्डी को भेजने का सुझाव  दिया। 

1913 में रामानुजन ने प्रोफेसर हार्डी को अपनी की हुई खोजों की लिस्ट भेजी , पहले तो प्रो हार्डी ने कुछ खास ध्यान नहीं दिया पर अचानक ही उन्हें रामानुजन की प्रतिभा का अहसास हुआ और उन्हें इंग्लैंड बुलाया और वहाँ कैम्ब्रिज में उनके साथ रिसर्च करने के लिए आमंत्रित किया। 

 रामानुजन प्रोफ हार्डी के साथ ट्रिनिटी कॉलेज में शोध  करने लगे और उनके गणित में किये गए शोध के लिए कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने बी ए की डिग्री दी।  यह दौर रामानुजन के जीवन का एक सुनहरी दौर था।  उनके द्वारा किये शोध हर रोज पत्रिकाओं में छप रहे थे और पूरी दुनिया के बड़े से बड़े गणितज्ञों का ध्यान रामानुजन पर केंद्रित हो गया था।  इसी बीच रामानुजन टी बी रोग का शिकार हो गए और उनकी हालत बिगड़ने लगी। 

1729 हार्डी – रामानुजन नंबर

1729 इस नंबर को हार्डी – रामानुजन नंबर कहा जाता है।  इसके पीछे एक विशेष कहानी है।  जब रामानुजन इंग्लैंड में थे तब उनकी तबियत अचानक खराब हो गयी थी और उनको अस्पताल में दाखिल करवाया गया।  उनसे मिलने प्रो हार्डी पहुंचे।

रामानुजन के पूछने पर प्रो हार्डी ने बताया के वो टैक्सी से आये है।  रामानुजन ने उनसे टैक्सी का नंबर पूछा तो प्रो हार्डी ने बोला के टैक्सी का नंबर बहुत बोरिंग है उसका नंबर था 1729। तो रामानुजन ने जवाब दिया के यह नंबर बोरिंग नहीं है बल्कि एक दिलचस्प नंबर है।

 उन्होंने बताया के जब किसी संख्या को अपने आप से गुणा किया जाता है तो उसको वर्ग या इंग्लिश में स्क्वेयर कहा जाता है। जैसे हमें अगर 3 का वर्ग निकालना है तो 3 को 3 से गुणा करना होगा जिसका उत्तर 9 आएगा।

ठीक इसी तरह से घन या क्यूब का मतलब होता है किसी संख्या को अपने-अपने से तीन बार गुणा करना जैसे अगर हमें 3 का घन निकालना होगा तो 3x3x3=27 आंसर आएगा।

अब 1729 ऐसी संख्या है जिसको दो तरीके से दो संख्याओं के घन के रूप में लिखा जा सकता है। 13

पहली दो संख्या तो 1 और 12 है यानी 1x1x1+12x12x12=1+1728=1729

दूसरी दो संख्या 9 और 10 हैं यानी 9x9x9+10x10x10=729+1000=1729 

इस तरह यह नंबर बोरिंग न होकर बहुत दिलचस्प है।  तभी से 1729 नंबर को हार्डी – रामानुजन नंबर कहा  जाने लगा। 

रॉयल सोसाइटी का सदस्य बनना

रामानुजन को उनके विलक्षण शोध के लिए रॉयल सोसायटी का सदस्य चुना गया।  वो इतिहास के पहले और एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्हे बहुत कम उम्र में ही रॉयल सोसायटी की सदस्य्ता मिली थी और वो पहले ऐसे भारतीय थे जिन्हे ट्रिनीटी कॉलेज से फ़ेलोशिप मिली थी।  

अभी भी उनके शोध रुके नहीं थे।  वो वहां रह कर भी हर रोज़ नए से नए शोध कर रहे थे और लोगों को गणित में एक नया राह दिखा रहे थे। परन्तु वहां पर उनकी तबियत बिगड़ने लगी और डॉक्टरों की सलाह पर वो वापिस अपने देश आ गए और मद्रास की यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक के पद पर काम करने लगे और अपनी गणित के शोधों को अब यहां पर जारी रखा। 

श्रीनिवास रामानुजन की मृत्यु

अपने देश वापिस लौटने पर भी उनकी हालत में सुधार न हुआ।  कितने ही डॉक्टरों वैद्यों ने उनका इलाज किया परन्तु उनकी बिगड़ती सेहत में ज़रा भी फर्क न पड़ा।  टी बी की बीमारी ने बेशक उनको जकड़ लिया था परन्तु उनका मष्तिष्क अभी भी गणित में रमा हुआ था। 

आखिर इस गंभीर बीमारी से झूझते हुए वो 26 अप्रैल 1920 को अपने श्वास त्याग गए।  उनकी मृत्यु के समय उनकी उम्र महज़ 33 वर्ष थी।  उनके मित्रों , विद्यार्थिओं या जिन्होंने भी उनके साथ काम किया था उनको , रामानुजन की मृत्यु का बहुत सदमा लगा क्योंकि इतनी कम उम्र में एक महान विद्वान का जाना किसी सदमे से कम भी न था। 

रामानुजन ने कभी भी गणित की कोई शुद्ध शिक्षा प्राप्त नहीं की थी।  वो हमेशा दूसरे विषयों में फेल होते थे और केवल गणित में पास होते थे।  गणित के लिए की गयी उनकी खोजें आज तक विद्यार्थिओं में प्रचलित हैं और गणित की पढ़ाई करने वाले उनके सूत्रों को भी पढ़ते हैं। आज गणित के क्षेत्र में उनका नाम बहुत सत्कार से लिया जाता है। 

एक समय ऐसा भी आया था उनके जीवन में जब वो पेट भरने के लिए भीख तक मांगने को मजबूर हो गए थे। उनके घर की आर्थिक हालत ठीक न होने के बावजूद भी वो लिखने के लिए फट्टे का इस्तेमाल किया करते थे। 

रामानुजन ने इंग्लैंड में रहते वहां पर होती जातिवाद के संघर्ष को देखा। रामानुजन के जीवन पर हॉलीवुड में एक फिल्म भी बनाई गयी थी जिसका नाम था ” द मैन हु नो  इन्फिनिटी ”  और इस फिल्म को पूरे विश्व में बहुत पसंद किया गया था। 

रामानुजन एक विद्वान थे।  जिन्होंने बहुत कम उम्र में बहुत बड़े मुकाम को हासिल कर लिया था। उनकी कल्पना से बने सूत्रों ने गणित को एक नई राह दी। आज वो कितने ही विद्यार्थिओं के प्रेरणा स्रोत हैं।  ऐसे महान विद्वान को हम शत शत नमन करते हैं जिन्होंने विपरीत हालातों के होते हुए भी खुद को सकारात्मक रखा और दृढ निश्चय से कामयाबी की तरफ बढ़ते गए। 

Rahul Sharma

हमारा नाम है राहुल,अपने सुना ही होगा। रहने वाले हैं पटियाला के। नाजायज़ व्हट्सऐप्प शेयर करने की उम्र में, कलम और कीबोर्ड से खेल रहे हैं। लिखने पर सरकार कोई टैक्स नहीं लगाती है, शौक़ सिर्फ़ कलाकारी का रहा है, जिसे हम समय-समय पर व्यंग्य, आर्टिकल, बायोग्राफीज़ इत्यादि के ज़रिए पूरा कर लेते हैं | हमारी प्रेरणा आरक्षित नहीं है। कोई भी सजीव निर्जीव हमें प्रेरित कर सकती है। जीवन में यही सुख है के दिमाग काबू में है और साँसे चल रही है, बाकी आज कल का ज़माना तो पता ही है |

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