तिब्बत का इतिहास Tibet History in Hindi

Tibet History in Hindi – तिब्बत एक ऐसा देश जो, स्वतंत्र देश जरूर है लेकिन एक देश का नियंत्रण इस पर है |  

तिब्बत का विवाद हमेशा से ही पूरी दुनिया में चर्चा का विषय रहा है, लेकिन अब दुनिया के लोग धीरे धीरे यह मानने लगे हैं कि तिब्बत एक देश है जो कि PRC यानी कि Chinese सरकार द्वारा चलाया जाता है |

भारत और चीन की आजादी के साथ ही तिब्बत पर चीन ने हक़ जमा लिया लेकिन क्या आप जानते हैं कि तिब्बत भारत से सटे उन चुनिंदा देशों में से है, जिन पर अंग्रेजों द्वारा कब्जा नहीं किया जा सका था | तिब्बत का इतिहास उस पर अपना हक बताने वाले चीन से भी ज्यादा समृद्ध रहा है |  

Tibet History in Hindi

तिब्बत का पहला साम्राज्य Tibet History in Hindi

तिब्बत का इतिहास शुरू होता है साल 600 के बाद से | इसके बाद से ही तिब्बत को बसाया गया था और उस तिब्बत की नींव डाली गई थी जो कि आज हमारी नजरों के सामने है | तिब्बत के पहले साम्राज्य को imperial age के नाम से याद किया जाता है |  

Imperial age की शुरुआत हुई राजा Namri Songsten के साथ, ये तिब्बत के पहले राजा थे | इन्हीं के राज्य में ल्हासा को पहली बार तिब्बत की राजधानी बनाया गया था और तब से अब तक ल्हासा तिब्बत की राजधानी बनी हुई है |

Imperial age खत्म हुआ साल 842 को जब राजा langdarma को कैद कर लिया गया था | King langdarma किन हालातों में कहाँ गायब किए गए थे ये तो अब तक कोई भी नहीं जान पाया है लेकिन King Langdarma के जाने के बाद entry हुई तिब्बत के सबसे बड़े दोस्त या तिब्बत के लोगों के शब्दों में कहा जाए तो सबसे बड़े दुश्मन की, यानी कि चाइना की | वही चाइना जिसकी PRC आज तिब्बत को अपना बताती है |

उस वक़्त भी चाइना और तिब्बत के बीच सीमा का ही विवाद हुआ था | चाइना तिब्बत पर कब्जा करना चाहता था लेकिन कर नहीं कर पा रहा था | 200 सालों तक चले इस विवाद के बाद 821 में, King Langdarma के गायब होने से कई साल पहले एक संधि हुई | 

उस संधि का नाम था चाइना तिब्बत शांति प्रस्ताव | इस प्रस्ताव के अंतर्गत चाइना और तिब्बत के बीच यह तय हुआ था कि दोनों ही देश अपनी अपनी सीमाओं में रहेंगे और एक दूसरे पर कब्जा नहीं करने की कोशिश करेंगे | आपके मन में ये सवाल तो आ ही रहा होगा कि इतना शक्तिशाली चाइना, तिब्बत के आगे शांति प्रस्ताव कैसे लेकर गया | 

दोस्तों चाइना मौजूदा वक़्त में ताकतवर है और तिब्बत इस वक़्त कई देशों की सहायता से चल रहा है, लेकिन उस वक़्त तिब्बत का रौब पूरी दुनिया में था | Imperial age के ही कई राजाओं ने तिब्बत को शिखर तक पहुंचाने मे सहायता की थी | 

राजा Trisong Deutsen ने अपनी सेना को मजबूत बनाया था और उन्होंने चाइना और मध्य एशिया के कई देशों पर सफलता पूर्वक सैन्य अभियान चलाया था | यही कारण था कि साल 821 में चाइना ने खुद आगे से आकर शांति का प्रस्ताव दिया था | 

इस शांति के प्रस्ताव के निशान आपको तिब्बत और चाइना में कई जगह नजर आ जाएंगे | सबसे ज्यादा प्रसिद्ध निशान है Jokhang मंदिर के बाहर लगा शिलान्यास | साल 1050 के दौरान तक चले इस शांति प्रस्ताव के बीच में या कई साल तक बाद तक तिब्बत के इतिहास के बारे में पता नहीं चलता | 

मंगोलों से बचा रहा तिब्बत Mangol Tibet History in Hindi

तिब्बत का पन्ना विश्व इतिहास में फिर खुलता है साल 1240 में | ये वही साल थे जब चंगेज खान और उसके वंशज पूरी दुनिया में कोहराम मचा रहे थे उनकी नजर तिब्बत पर भी पड़ी | उन्होंने 1240 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया और ये कब्जा साल 1244 तक रहा | चीन के साथ साथ चाइना के भी कुछ हिस्सों में मंगोलों का कब्जा था लेकिन तिब्बत से उसकी religious authority को नहीं छीना गया ना ही तिब्बत को चाइना के दूसरे हिस्सों में मिलाया गया | 

इसके पीछे कारण था मंगोल राजकुमार गोदान खान | गोदान चंगेज खान का पोता था और उसे तिब्बत और अन्य पूर्वी सैन्य अभियानों की जिम्मेदारी दी गई थी | 

इसी दौरान उसकी मुलाकात हुई, लामा साक्य पंडिता से | लामा साक्य पंडिता से मिलकर वो इतना प्रभावित हुआ कि उसने खुद को बौद्ध धर्म में परिवर्तित कर लिया और लामा को अपना गुरु मान लिया | इसी के साथ ही तिब्बत की religious authority भी बरकरार रही | 

जहां तिब्बत में यह चल रहा था वहीँ दूसरी तरफ चाइना में युआन साम्राज्य की शुरुआत Kublai Khan द्वारा शुरू की गई थी | Kublai, मंगोल सेनाओं में था | वह चंगेज की तरह ही क्रूर था, लेकिन तिब्बत के साथ अच्छा ये हुआ कि Kublai Khan लामा साक्य पंडिता को अपना गुरु मानता था और उसने तिब्बत को संरक्षण देना शुरू कर दिया |

साल 1350 के आसपास चाइना पर कब्जे किए बैठे मंगोल साम्राज्य के वंशजों को चाइना से हटना पड़ा और चाइना मे मिंग साम्राज्य की शुरुआत हुई | चाइना और तिब्बत भले ही अलग अलग हों लेकिन चाइना के जिक्र के बिना तिब्बत का इतिहास नहीं बताया जा सकता | 

इसके पीछे एक कारण ये भी है कि चाइना में बने हर साम्राज्य ने तिब्बत पर कब्जा करने की कोशिश जरूर की है | मिंग साम्राज्य के साथ वाद विवाद के साथ तिब्बत का साथ चलता रहा और उसके बाद कुछ remarkable हुआ | 

The Great Fifth

साल 1578 में तिब्बत को इनके तीसरे दलाई लामा मिले, ये थे Sonam ग्यात्सो जो कि तिब्बत में एक स्कुल चलाते थे | उन्हें ये खिताब दिया मंगोल शासक Altan Khan ने | इस खिताब के बदले में Altan Khan को Kublai Khan का पुनर्जन्म बताया गया जिससे उसकी सेनाओं को बल मिला |

साल 1645, ये वो साल था जब तिब्बत के लिए बहुत कुछ remarkable होना शुरू हुआ | तिब्बत अब तक चीनी साम्राज्यों के संरक्षण में और उनके साथ विवादों में रहा था लेकिन पांचवे दलाई लामा ने तिब्बत को हर तरह से स्वतंत्र घोषित कर दिया | 

उन्हें चाइना के साथ कई गठबंधन किए | उन्हें चाइना और तिब्बत के इतिहास में The Great Fifth के नाम से भी जाना जाता है | इसके बाद से कई दशकों तक तिब्बत आजाद रहा, लेकिन साल 1717 में फिर इस आजादी पर ग्रहण लग गया | 

इस बार ये ग्रहण लगाया, मंगोलों ने | Dzungar मंगोलों ने अपने सैनिक भेजकर तिब्बत पर कब्जा कर लिया | इस कब्जे से निकलने के लिए तिब्बत की मदद की चाइना ने | 

चाइना में मौजूद Qing साम्राज्य ने चाइना की मदद करके उसे मुसीबत से निकाल तो लिया लेकिन उस पर कब्जा भी कर लिया | ये कब्जा केवल तिब्बत पर ही नहीं बल्कि वियतनाम, मंगोलिया, कोरिया, नेपाल और भारत के कई हिस्सों तक फैला हुआ था | Qing साम्राज्य उस वक़्त काफी मजबूत था |

तिब्बत की स्वतंत्रता Tibet Independence History in Hindi

लेकिन कब्जे के ये बादल भी छंटे और साल 1920 में 13वें Dalai लामा ने यह घोषित कर दिया कि चाइना और तिब्बत का रिश्ता भक्त और पुजारी जैसा है और तिब्बत आजाद है | इसी दौरान एक साल तक ब्रिटिश शासन द्वारा भी तिब्बत पर 1903-04 तक कब्जा करके रखा था | 

13 वें दलाई लामा द्वारा आजादी घोषित करने के बाद शिमला समझौता हुआ जिसमें ब्रिटिश, चीनी और तिब्बत के प्रतिनिधि मिले और ये निर्धारित करने बैठे कि भारतीय सीमाएं क्या होंगी | Irony ये है कि इस मीटिंग में भारत मौजूद ही नहीं था | हालांकि इस प्रस्ताव को चाइना ने नहीं माना और दक्षिणी तिब्बत को ब्रिटेन को दे दिया गया |

फिर आया साल 1950, जब भारत, चाइना, तिब्बत लगभग हर देश को ब्रिटेन से आजादी मिली चुकी थी | तिब्बत आजादी का जश्न मना पाता इससे पहले रेडियो पर ये घोषणा हुई कि चीन के 40 हजार सैनिक तिब्बत में घुस आये हैं | इन्होंने तिब्बत पर कब्जा किया और 14 वें दलाई लामा को कुछ अधिकार दे दिए | 

हालांकि यह बहुत दिनों तक नहीं चला और 1959 और 1965 में तिब्बत द्वारा फिर से संघर्ष करने की कोशिश की गई लेकिन चीन की सरकार ने उनका हर संघर्ष कुचल दिया | उसके बाद भी कई सारे movements हुए, और चीन के साथ तिब्बत का संघर्ष अभी भी जारी है |

Mohan

I love to write about facts and history. You can follow me on Facebook and Twitter

Leave a Comment