धन श्री गुरु नानक देव का जीवन परिचय

पीरों के पीर, फकीरों के फ़क़ीर, संतों के संत और गुरुओं के गुरु थे धन श्री गुरु नानक देव जी |

प्रिय पाठकों आज हम आपको श्री गुरु नानक देव जी के जीवन के बारे में बताने जा रहे हैं | आइए जानते हैं Shri Guru Nanak Dev Biography in Hindi.

वैसे तो गुरु नानक देव जी के जीवन के बारे में बताना हमारे बस की बात नहीं है | क्यूंकि ना तो मुझ में इतनी बुद्धि है ना ही उनके बारे में बताना संभव है | फिर भी किताबों, ग्रंथों और इंटरनेट के माध्यम से जो जानकारी हमने इकठ्ठा की है उसे हम आपके साथ साँझा करने जा रहे हैं |

जब जब दुनिया में अत्याचार बढ़ता है तब तब इस दुनिया में ईश्वर के भेजे हुए अवतार जन्म लेते हैं |

भगवान अधर्म के विनाश के लिए और धरती पर धर्म की स्थापना के लिए सच्चे योद्धाओं और फकीरों को इस धरती पर भेजते रहते हैं |

ऐसे ही एक फकीर थे श्री गुरु नानक देव जी |

नयी पीढ़ी जो बहुत तर्कशील है और ईश्वर में बहुत कम यकीन रखती है उन्हें Guru Nanak Biography को ज़रूर पढ़ना चाहिए |

Shri Guru Nanak Dev ji दुनिया को एक संदेश देने के लिए आए थे | जिस संदेश को वो जन जन तक पहुँचाने के लिए धरती पर आए थे वो आज उनके उपदेशों के माध्यम से लोगों तक पहुँच रहे हैं |

श्री गुरु नानक देव जी का जन्म उस समय में हुआ था जब दुनिया धर्म, जाति और वर्णों के आधार पर बहुत बंटी हुई थी |

गुरु नानक देव का जीवन परिचय Guru Nanak Dev Biography in Hindi

Guru Nanak Dev Biography in Hindi

गुरु नानक देव का जन्म Guru Nanak Dev Ji Birthday

गुरु नानक देव जी का जन्म 29 नवंबर 1469 को हुआ था, लेकिन सिख कैलेंडर के अनुसार उनका जन्म 15 अप्रैल, 1469 को मनाया जाता है |

Guru Nanak Dev Ji का जन्म एक खत्री परिवार में हुआ था | उनके पिता का नाम कल्याण चंद मेहता था जिन्हें लोग मेहता कालू भी कहते थे | उनकी माता का नाम त्रिपता देवी था |

उनका जन्म पाकिस्तान के तलवंडी में हुआ था जो कि आज ननकाना साहिब है | उनकी एक बड़ी बहन भी थी जिसका नाम नानकी था |

गुरु नानक के पिता तलवंडी में पटवारी एक थे | वो चाहते थे कि गुरु नानक पढ़ लिख कर कोई अच्छा बिज़नेस व्यापार करे |

लेकिन गुरु नानक का मन पढ़ाई लिखाई में नही लगता था | वो बचपन से ही ध्यान करने लगे थे | उन्होने अरबी और फ़ारसी भाषाएँ आसानी से सीख ली थी |

गुरु नानक देव जी के चमत्कार

उनके पिता चाहते थे कि वो पढ़ें लिखें और घर का काम काज भी संभालें | ऐसे में एक दिन उनके पिता ने उनको अपने मवेशियों को चराने के लिए उन्हें साथ भेजा | तो वो मवेशियों की खुला छोड़ कर ध्यान में लीन हो गये |

मवेशी किसी दूसरे के खेतों में घुस कर सारी फसल बर्बाद कर आए | इस पर उन खेतों के मलिक बहुत गुस्सा हुए|

लेकिन जब वो सब लोग दोबारा उस फसल को देखने गये थे तो उन्होने एक अद्भुत चमत्कार देखा, जो फसल पूरी तरह खराब हो गयी थी वो पहले की तरह से लहलहा रही थी |

तब से सब जान गये थे कि गुरु नानक कोई आम इंसान नही हैं बल्कि वो कोई एक ईश्वरीय अवतार हैं |

क्यूंकि श्री गुरु नानक देव जी संसार से परे थे उनकी बुद्धि बहुत तेज थी वो तर्क की बात किया करते थे | उन्हें शिक्षा देने वाले गुरु ने उनकी अद्भुत प्रतिभा को पहचान लिया था | उन्होने गुरु नानक के पिता को बताया कि वो कोई साधारण बालक नही हैं |

इस पर गुरु नानक के पिता जी बहुत मायूस हुए क्यूंकि उन्हें तो अपने परिवार को संभालने वाला एक पुत्र चाहिए था | जो उनकी तरह काम धंधे की ओर ध्यान दे |

अपने पुत्र को कारोबार की समझ देने के लिए उनके पिता मेहता कालू ने उन्हें 20 रुपये देकर सौदा खरीद कर व्यापार करने को कहा |

लेकिन नानक तो फकीर थे उनसे किसी की पीड़ा देखी नही जाती थी उन्होने 20 रुपये जो कि उस समय में बहुत रकम थी, उससे जो भी राशन खरीदा वो ग़रीब भूखे लोगों को खिला दिया |

इस पर जब उनके पिता जी ने उनसे पूछा कि उन्होने ये क्या किया तो श्री गुरु नानक ने कहा उन्होने सच्चा सौदा किया है |

इस पर उनके पिता को लगा की अब तो उनका पुत्र उनके हाथ से बिल्कुल ही निकल गया | तो उन्होने सोचा की गुरु नानक का विवाह करवा देना चाहिए जिससे उन पर गृहस्थी की ज़िम्मेवारी आ जाएगी और गुरु नानक का ध्यान संसारिक कामों में लगने लग जाएगा |

गुरु नानक का विवाह

24 सितंबर, 1487 को उनका विवाह गुरुदासपुर जिले के पास लाखौकी गांव में रहने वाले मूल चंद की बेटी सुलक्षणा देवी से कर दिया गया | उनके दो पुत्र हुए जिनका नाम श्रीचन्द और लक्ष्मीदास था |

गुरु नानक का अपनी बहन नानकी से बहुत स्नेह था जिसका विवाह जय राम से हुआ था जो Sultanpur में रहते थे|

उनके जीजा जयराम ने गुरु नानक देव जी को सुल्तानपुर बुला लिया | अपने जीजा के कहने पर वो सुल्तानपुर में गवर्नर दौलत ख़ान के पास काम करने लगे |

कुछ साल उन्होने वहीं काम किया लेकिन वो जो भी कमाते उसका अधिकांश भाग ग़रीबों में बाँट देते थे |

ज्ञान की प्राप्ति

1496 में श्री गुरु नानक देव जी को असल ज्ञान की प्रति हुई थी | उस समय श्री गुरु नानक देव जी सुल्तानपुर में ही थे | वो रोजाना वहाँ नदी में स्नान करने जाया करते थे लेकिन एक दिन जब वो स्नान करने के लिए नदी में गये तो तीन दिन तक वापिस नही आए |

उस समय उन्हें असल ज्ञान की प्राप्ति हुई | जब श्री गुरु नानक वापिस आए तो उन्होने जो पहले शब्द कहे थे वो थे “यहाँ कोई हिंदू और कोई मुसलमान नही है”

ये वो समय था जब श्री गुरु नानक जी को अपना असली मकसद पता चल गया था | इसके बाद उन्होने अपना घर बार त्याग दिया और वो पूरी दुनिया को असल ज्ञान बताने के लिए निकल पड़े |

गुरु नानक देव जी की उदासी (यात्राएँ)

उन्होने पैदल ही बड़ी लंबी लंबी यात्राएं की जिन्हें उदासी भी कहा जाता है | श्री गुरु नानक देव जी ने 28000 किलोमीटर की 5 लंबी यात्राएँ पूरी की |

श्री गुरु नानक देव जी ने काशी, अयोध्या, कुरुक्षेत्र, श्री लंका, सिक्किम, बग़दाद, मक्का मदीना और कंधार तक की यात्राएं की |

अपनी यात्राओं में उन्होने लोगों को एक ईश्वर को मानने, मेहनत हक़ हलाल की कमाई करने जैसे संदेश दिए |

उन्होने लोगों को बताया कि भगवान, रब्ब, अल्लाह हमारे अंदर है उसे बाहर ढूंढ़ने की बजाए अंदर ही उसकी खोज करनी चाहिए |

अपनी 5 यात्राएं पूरी करने के बाद वो करतारपुर साहिब पाकिस्तान में आकर रहने लगे | अपने जीवन के आख़िरी 17-18 साल उन्होने करतारपुर में ही बिताए |

श्री गुरु नानक ने लोगों को नाम जपो, कीर्त करो और वंड छको का संदेश दिया |

नाम जपो – नाम जपो का अर्थ है की नाम का जाप करें | उस रब्ब, अल्लाह की खोज अपने अंदर ही करनी चाहिए| नाम जप कर ही ईश्वर की प्राप्ति की जा सकती है |

कीर्त करो – कीर्त करो का अर्थ है मेहनत, हक़ हलाल की कमाई करके खाओ | बेईमानी और धोखेबाजी से कमाया धन सुख और शांति नही दे सकता |

वंड छको – जो भी खाओ मिल बाँट के खाओ |

ये संदेश गुरु नानक देव जी ने संसार को दिए थे जिन पर चलना आज के समय में बहुत ज़रूरी है | हम इन संदेशों को सुन तो लेते हैं लेकिन इन्हें अमल में नही लाते |

वरना कोई भी इस संसार में दुखी नही रहता |

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Mohan

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