Jai Bhim Real Story in Hindi

20 मार्च 1993 की सुबह अचानक कुछ पुलिसवाले तेज़ी से राजकंनू के घर पहुंचते हैं और घर में राजकंनू की गर्भवती पत्नी पार्वती होती है। पुलिसवाले पार्वती से उसके पति के बारे में पूछते है पर राजकंनू तो काम के सिलसिले में दूसरी जगह गया होता है तो पार्वती बोलती है के वो काम के लिए बाहर गए हैं । 

पुलिसवाले बताते है के गांव के सेठ के घर गहनों की चोरी हुई है और ये चोरी राजकंनू ने की है तो उसके लिए ही पुलिस उसे तलाश कर रही है। 

jai bhim real story in hindi
Jai Bhim Real Story in Hindi

पुलिसवालों की बात सुनकर पार्वती बोलती है के उसे इसके बारे में कुछ नहीं पता और उसका पति कभी चोरी नहीं कर सकता । पुलिसवाले उसकी एक नहीं सुनते और उसे जबरदस्ती अपनी जीप में बैठा कर ले जाते हैं ।

पार्वती के साथ राजकंनू के भाई , बहन और जीजा को भी उठा लेते हैं और राजकंनू के छोटे बेटे को भी पुलिस वाले जबरदस्ती थाने ले जाते हैं और थाने जाकर पुलिस वाले अपना वो रूप दिखाते हैं जो इंसानियत से परे है । 

वो उन सबको बहुत मारते  है वो उससे राजकंनू का पता पूछते हैं और उसने चोरी के गहने कहाँ छुपाये ये भी पूछते हैं पर किसी के पास कोई जवाब नहीं होता । 

यहां तक की राजकंनू की गर्भवती पत्नी और छोटे बच्चे को भी पूरी रात पीटा जाता है |

ये कहानी कुछ जानी पहचानी लग रही है ? जी हाँ , ये है जय भीम फिल्म की असली कहानी। जय भीम जबसे रिलीज़ हुई है लोगों के अंदर इसके बारे में और अधिक जानने की इच्छा बढ़ गयी है।

जिसने भी यह फिल्म देखी उसने इस फिल्म के असल किरदारों के बारे में इंटरनेट पर सर्च करना शुरू कर दिया, फिल्म है ही इतनी कमल की के इसके बारे में बातें तो होंगी ही। फिल्म में दिखाए गए सभी किरदार चाहे वो राजकंनू हो या पार्वती या इनको इंसाफ दिलवाने वाले के चंद्रु वकील ( जस्टिस चंद्रु के बारे में यहां पढ़ें ) हर कोई इनके बारे में और अधिक जानना चाहता है। 

आज हम आपको इस फिल्म की असली कहानी को बताएंगे। 

जय भीम फिल्म की सच्ची कहानी Jai Bhim Real Story in Hindi

मुदन्नी गांव जो तमिलनाडु का एक छोटा सा गांव है , वहां एक आदिवासी जनजाति रहती है जिसे इरुलर  आदिवासी समुदाय कहा जाता है।  इस समुदाय के कुछ लोग गंभीर अपराधों में पकड़े गए जिसकी वजह से ये पूरा समुदाय कलंकित हो गया और इसे अपराधियों का समुदाय कहा जाने लगा।

इसी समुदाय के लोग बड़े सेठों और जमींदारों के खेतों में से चूहे अदि पकड़ने का काम करते और आस पास गांव में कहीं किसी के घर चबूतरे पर सांप वेगरा आ जाये तो उसे पकड़ने का काम करते।  

मुदंनी गांव के सरपंच के घर सांप घुस आया तो उसके नौकर समुदाय से राजकंनू को बुला कर लेकर आये। राजकंनू ने सांप को पकड़ा और चला गया पर इसके कुछ देर बाद उनके घर चोरी हो गयी जिसमे गहने और नकदी चुराई गयी और इस का इल्जाम लगा राजकंनू पर। और इसी चोरी के इलज़ाम में पुलिस राजकंनू के पुरे परिवार को उठा लायी थी और प्रताड़ित कर रही थी। 

अगले दिन राजकंनू काम से घर वापिस आ रहा था तो पुलिस ने उसे पकड़ लिया और जबरदस्ती थाने ले जाया गया और उसे खूब मारा पीटा।राजकंनू के मिलने से उसके सभी रिश्तेदारों को छोड़ दिया। 

पीट पीट कर जुर्म कबूल करवाने की कोशिश की गई

राजकंनू को बुरी तरह पीटा और उसे चोरी के गहने और नकदी पूछी गयी और मजबूर किया के वो चोरी को माने पर जो गुनाह उसने किया ही नहीं वो कैसे मान ले । 

पुलिसवाले राजकंनू की पत्नी को छोड़ देती है और अगले दिन खाना लेकर आने के लिए बोलते है।अगले दिन पार्वती खाना लेकर आती है तो राजकंनू की हालत देख कर घबरा जाती है।  उसे खिड़की के साथ बंधा हुआ था और शरीर पर कोई कपड़ा नहीं था और ऐसा कोइ अंग नहीं था जिसपर चोट के घाव न हों।  

पुलिसवाले राजकंनू को बाहर फ़ेक देते हैं,पार्वती उसे खाना खिलाने लगती है पर उसकी हालत इतनी खराब थी के वो खाना भी नहीं खा पा रहा था और वो बेहोश हो जाता है। 

जब पार्वती इसके बारे में पुलिसवालों से बोलती है तो पुलिसवाले उसे धमका कर घर भेज देते हैं और इसी रात को खबर फ़ैल जाती है के राजकंनू जेल से भाग गया है।पार्वती को इस बात पर विश्वास नहीं होता क्योंकि उसने देखा के राजकंनू भाग सकता है क्योंकि वो तो अपनी आंखें भी नहीं खोल पा रहा था और ठीक से बोल भी नहीं पा रहा था तो भागेगा कैसे ?

इस इलाके से कुछ दूर मीनसुरुट्टी पुलिस स्टेशन एरिया में 22 मार्च को एक लाश मिलती है जिसके शरीर पर घाव के निशान थे पर पुलिस उसकी शनाख्त नहीं कर पा रही थी।उधर दूसरी तरफ पार्वती अपने पती को ढूंढने निकल पड़ी थी। 

उसके इलाके के हर एक बड़े व्यक्ति से मदद मांगी,हर एक पुलिस स्टेशन घूमी पर उसे उसके पती का कुछ पता नहीं मिला। 

चंद्रु नाम के वकील से मिली न्याय की उम्मीद

फिर वो एक दिन एक ऐसे वकील से मिली जो ह्यूमन राइट्स के केस लड़ता था और इसके लिए पैसे भी नहीं लेता था और ये वकील था के चंद्रु जो बाद में हमारे देश के एक सम्मानीय जस्टिस बने। 

वकील चंद्रु ने पार्वती की पूरी कहानी सुनी और कोर्ट में हेबियस कॉर्पस यानी बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका मद्रास हाईकोर्ट में डाली।

चंद्रु राजकंनू को ढूंढने के लिए पुरे तमिलनाडु से लेकर केरल तक जाता है क्योंकि वो किसी भी कीमत पर राजकंनू को ढूंढना चाहता है।  वो उस डॉक्टर से भी मिलता है जिसने उस नाज़ायज़ लाश का पोस्ट मॉर्टम किया होता है। 

पोस्ट मॉर्टम में ये बताया जाता है के जिस व्यक्ति की ये लाश है उसकी मौत छाती की हड्डियां टूटने से हुई है तो चंद्रु डॉक्टर को ये प्रश्न पूछता है के क्या ऐसा हो सकता है के इस व्यक्ति की छाती पर किसी ने जोर से हमला किया हो और लगातार हमला किया हो जिसकी वजह से हड्डी टूटी हो तो डॉक्टर इस बात की हामी भरता है के ऐसे हो सकता है। 

और तभी चंद्रु का दिमाग घूमता है और वो इस को कस्टोडियल डेथ यानी पुलिस हिरासत में मौत का केस मान लेता है।

फिल्म में हमे ये दिखाया गया है के एक जगह पुलिस और वो चोर और एक सुनार इकठे बैठे सौदा कर रहे हैं और चोर खुद को बचने की कीमत के बदले उन पुलिसवालों को कुछ राशि देता है।  तांकि पुलिसवाले उस चोर की जगह किसी और इंसान को पकड़ें और उससे जबरन जुल्म कबूल करवाएं। 

इस गुनाह में सुनार भी शामिल होता है और पुलिस वाले उसे झूठा गवाह बना कर अदालत में भी पेश करते हैं और वो सुनार ये गवाही देता है के राजकंनू उसके पास लूटे हुए गहने लेकर आया था बेचने के लिए। 

इस याचिका के बाद पुलिस को थोड़ा होश आता है और वो उस लाश की शनाख्त सेगई से करवाती है और पार्वती अपने पती की लाश को पहचान लेती है।

पुलिसवाले पार्वती को थाने बुलाते हैं और उससे केस वापिस लेने को बोलते हैं और बोलते हैं के अगर वो केस वापिस ले लेगी तो वो उसे बहुत सारा पैसा देंगे पर पार्वती ऐसा नहीं करती।वो अपने पती के कातिलों को सज़ा दिलवाना चाहती है। 

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पुलिस वाले आखिर ऐसा क्यों करते हैं ?

प्रमोशन के लिए। क्योंकि उन्होंने कुछ भी करके अपने बड़े अफसरों को खुश करना है और ये दिखाना है के वो कितने काबिल पुलिसवाले है चाहे इसके लिए उन्हें किसी निर्दोष की जान क्यों न लेनी पड़े।  

इसके बाद मामला धीरे धीरे आगे बढ़ता है और मद्रास हाईकोर्ट पार्वती को मुआवज़ा देने और इस केस की सीबीआई जाँच का आदेश देती है पर चंद्रु उन पुलिसवालों को सज़ा दिलवाना चाहता था क्योंकि सेशन कोर्ट ने उन पुलिसवालों के खिलाफ कोई सबूत न होने की वजह से उन्हें बरी कर दिया उनके खिलाफ सबूत न मिलने की सबसे बड़ी वजह ये थी के उन्होंने उस सुनार को फ़र्ज़ी गवाह बना कर पेश किया और ऐसे ही एक दो और फ़र्ज़ी गवाहों को पेश किया था जिसकी वजह से वो निर्दोष साबित हुए। 

चंद्रु ने हार नहीं मानी क्योंकि वो जानते थे के राजकंनू की मौत के पीछे इन 5 पुलिसवालों का ही हाथ है और इन्होने ने ही सबूतों और गवाहों को मिटाया है और फ़र्ज़ी गवाह पेश किये हैं।असलियत की तलाश में चंद्रु केरल तक पहुंचा और उसने राजकंनू के 2 साथियों को ढूंढ निकला और उनसे उस दिन की घटना के बारे में विस्तार से जाना और उन्हें अपना गवाह बना कर अदालत में पेश किया। 

चंद्रु को सच्चाई तक पहुंचने में बहुत समय लग गया पर इतने समय में उन्होंने हर नहीं मानी क्योंकि उन्होंने ये ठान लिया था के राजकंनू के हत्यारों को सज़ा दिलवानी है। 

सालों की कड़ी तहकीकात और मेहनत के बाद 2006 में मद्रास हाईकोर्ट ने उन 5 पुलिसवालों को राजकंनू की मौत का जिम्मेवार माना और फ़र्ज़ी सबूत और गवाह पैदा करने का भी आरोप लगा। 

देर ही सही पर पार्वती को और राजकंनू को इंसाफ मिला। 13 साल तक चंद्रु ने खुद छानबीन की और इस केस को जीता। 

पुलिस और वकील की भूमिकाएं

इस फिल्म में इस पूरी घटना को बहुत अच्छे तरीके से दिखाया है,एक तरफ तो पुलिस की हैवानियत को देखते हुए जहाँ आपके अंदर नफरत और घिन पैदा होगी वहीं दूसरी तरह एक वकील की मेहनत से निर्दोष को मिले न्याय को देखकर आप इमोशनल हो जायेंगे।  

पर जो भी है, इस फिल्म ने सच में दर्शकों का दिल जीता है और ये इस साल की सबसे बेहतर फिल्म बन पाई है। 

इस फिल्म का इतना ज्यादा गहरा असर हुआ के साउथ इंडिया के बहुत सारे लोग पार्वती की मदद करने को तैयार हो गए हैं।

जस्टिस चंद्रु ने अपने जस्टिस वाले कार्यकाल में लगभग 96000 केसों का फैसला सुनाया है और वो लगभग 75 केसों की सुनवाई हर रोज करते थे। 

जय भीम फिल्म भारतीय सिनेमा की एक मील का पत्थर साबित हुई और इस फिल्म ने लोगों के अंदर भारतीय न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वाश और बढ़ा दिया है और एक सीख दी है के हालत कितने भी बुरे क्यों न हो जाएँ अगर हम हिम्मत और समझदारी से काम लेते हैं तो फैसला हमारे हक़ में होता है और ये फिल्म इस बात को बहुत अच्छे से समझती है।

भारतीय न्याय के प्रति विश्वास बढाती है

फिल्म को बहुत ज़मीनी तह पर बनाया गया है और कोई भी किस्सा असली कहानी से बाहर खुद नहीं गढ़ा जो ज्यादातर भारतीय फिल्मों में होता है।सच्चाई को सच्चाई की तरह ही दिखाया है। पार्वती के संघर्ष को देखकर सच में हमारे मन में बहुत सारे सवाल पैदा होते हैं।

क्या सच में हमारे समाज में कुछ समुदाय ऐसे है जो अभी भी ऐसी जिंदगी जी रहे हैं, जिनके पास अपने घर नहीं, जमीन नहीं और यहाँ तक की कोई प्रमाण पत्र भी नहीं। 

2 वक्त का खाना खाने के लिए वो बड़े घरों में चूहे सांप पकड़ने का काम कर रहे हैं और उनके पास खुद रहने को पक्के घर नहीं पर फिर भी ईंट के भट्ठे पर बड़े बड़े आलीशान घरों के लिए ईंटें बना रहे हैं। 

क्या सच में हमारे बीच ऐसे पुलिस वाले भी है जो दरिंदगी की सारी हदें पार कर देते हैं और इंसानियत को भूलकर केवल अपने स्वार्थ के बारे में सोचते हैं।

आज पार्वती कहाँ है ?ये सवाल भी आपके मन में आया होगा।आज पार्वती चेन्नई के एक दूर दराज़ के इलाके में किराये के मकान में रहती है और उसका गांव बढ़ ग्रस्त गांव है।यहां तक की उस जगह पर शौचालय भी नहीं है सबसे करीब सरकारी शौचालय उस गांव से 1 किलोमीटर दूर है। 

पर ख़ुशी की बात यह है के साउथ इंडियन के मशहूर फिल्म एक्टर और निर्देशक लॉरेंस राघव ने सेगई को पक्का घर बना कर देने का वायदा किया है।  

इस फिल्म का विस्तार पूर्वक रिव्यु हम पहले ही कर चुके हैं आप उसे यहां पढ़ सकते है। 

उम्मीद है के आप सेगई और राजकंनू की असली कहानी जान गए होंगे।  

Rahul Sharma

हमारा नाम है राहुल,अपने सुना ही होगा। रहने वाले हैं पटियाला के। नाजायज़ व्हट्सऐप्प शेयर करने की उम्र में, कलम और कीबोर्ड से खेल रहे हैं। लिखने पर सरकार कोई टैक्स नहीं लगाती है, शौक़ सिर्फ़ कलाकारी का रहा है, जिसे हम समय-समय पर व्यंग्य, आर्टिकल, बायोग्राफीज़ इत्यादि के ज़रिए पूरा कर लेते हैं | हमारी प्रेरणा आरक्षित नहीं है। कोई भी सजीव निर्जीव हमें प्रेरित कर सकती है। जीवन में यही सुख है के दिमाग काबू में है और साँसे चल रही है, बाकी आज कल का ज़माना तो पता ही है |

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