करतार सिंह सराभा का जीवन परिचय

Kartar Singh Sarabha Biography in Hindi – दोस्तों जिस आज़ाद देश में हम बड़ी शान से रह रहे हैं उसकी आज़ादी के लिए सैंकड़ों वीरों ने अपनी जाने कुर्बान कर दी । देश के लिए जान कुर्बान करने में पंजाबी हमेशा ही सबसे आगे रहे हैं । 

फिर चाहे वो भगत सिंह हों, शहीद उधम सिंह हों, मदन लाल ढींगरा या लाला लाजपत राय जैसे आज़ादी के मतवाले हों । सभी ने देश की आज़ादी और लोगों के अधिकारों के लिए लड़ते हुए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया ।

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ऐसे में एक क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा को अक्सर भुला दिया जाता है जिन्हें सिर्फ़ 19 साल की उम्र में ब्रिटिश हुकूमत ने फाँसी के फंदे पर चढ़ा दिया था । 

भगत सिंह भी करतार सिंह सराभा को अपना गुरु मानते थे । 

करतार सिंह सराभा का बचपन

करतार सिंह सराभा का जन्म 24 मे 1896 को पंजाब के साराभा गाँव में हुआ जो कि लुधियाना जिले में है । उनका जन्म एक समपन्न पंजाबी फैमिली में हुआ था । पर बचपन में ही उनके सर से पिता का साया उठ गया जिसके बाद उनके दादा बदन सिंह ने उनका और उनकी छोटी बहन का पालन पोषण किया ।

उन्होने अपनी नौंवी तक की शिक्षा लुधियाना में ही ली । इसके बाद वो उड़ीसा में अपने चाचा के पास आ गये जो की वहाँ वन विभाग अधिकारी के तौर पर कार्यरत थे ।

आगे की पढ़ाई उन्होने उड़ीसा में अपने चाचा के पास रहकर पूरी की । हाई स्कूल तक पढ़ाई उड़ीसा से करने के बाद 1912 में आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें अमेरिका भेजा गया । 

अच्छे स्कूल्स में पढ़ने और संपन्न परिवार में पलने बढ़ने के बाद करतार सिंह सराभा को कभी एहसास ही नहीं हुआ की उनका देश गुलाम है । पर जैसी ही उन्होने अमेरिका की धरती पर कदम रखा एक घटना ने उन्हें ये एहसास दिला दिया की वो एक गुलाम देश के नागरिक हैं । 

अमेरिका की धरती पर मिला मकसद

असल में जैसे ही वो जहाज़ से अमेरिका की धरती पर कदम रखते हैं तो उनकी गहन तलाशी ली जाती है । उनसे बहुत पूछताछ होती है और उनके सामान की भी बहुत तलाशी ली जाती है । 

जबकि दूसरे यात्रियों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाता । इस पर जब करतार सिंह उन अधिकारियों से इसका कारण पूछते हैं तो उन्हें जवाब मिलता है कि

“तुम भारत से आए है जो की एक गुलाम देश है”

ये शब्द सुनकर करतार सिंह हक्के बक्के रह जाते हैं, क्यूंकी उन्होने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं था की वो गुलाम देश के वासी हैं । पर उन अमरीकी अधिकारीयों के ये कुछ शब्द उनके मन पर गहरा असर डालते हैं ।

भारत को हमेशा से एक ग़रीब देश समझा जाता है लेकिन उस समय भी बहुत सारे भारतीय विदेशों में पढ़ाई किया करते थे । पर विदेशों में भारत की गुलामी की वजह से उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं होता था ।

विदेशों में होने वाले उस दुर्व्यवहार के खिलाफ भी भारतीयों ने बहुत सी लड़ाइयाँ लड़ी और आपस में एकजुट होने लगे । विदेशों में पढ़ने वाले भारतीयों ने महसूस किया की अगर विदेशों में उनके साथ ऐसा व्यवहार हो सकता है तो भारत में कमजोर तबके के लोगों के साथ कितना दुर्व्यवहार होता होगा ।

करतार सिंह सराभा के मन में भी भारत को आज़ाद करवाने की भावना जन्म ले चुकी थी । करतार सिंह ने अमेरिका की बार्केली यूनिवर्सिटी में अड्मिशन लिया । यूनिवर्सिटी में वो नालंदा क्लब ऑफ इंडियन स्टूडेंट्स नाम के एक प्लॅटफॉर्म से जुड़े हुए थे ।

1912 में पोर्टलैंड में भारतीयों का एक सम्मेलन हुआ । इस सम्मेलन में सोहन सिंह भकाना, हरनाम सिंह और लाला हरदयाल जैसी क्रांतिकारियों ने भाग लिया । 

लाला हरदयाल के भाषण को सुनकर करतार सिंह बहुत प्रभावित हुए और भारत की आज़ादी को ही अपने जीवन का मकसद बना लिया । 

सेन फ्रांसिस्को में लाला हरदयाल के साथ करतार सिंह जगह जगह भाषण देते और नौजवानों को एकजुट होने की अपील करते । लाला हरदयाल, भाई परमानंद और करतार सिंह के प्रयत्नों से अमेरिका में पढ़ने और काम करने आए नौजवान इकठ्ठा होने लगे ।

दूसरी तरफ भारत में नौजवान पहले से ही कॉंग्रेस की नरम नीतियों से खुश नहीं थे । 1907 में हुए सूरत अधिवेशन के बाद कॉंग्रेस दो टुकड़ों में बंट गई,

जिन्हें नरम दल और गरम दल कहा जाता है ।

नौजवान इस पक्ष में थे की हथियारों के बल पर ही आज़ादी हासिल की जा सकती है । 1909 में मदन लाल ढींगरा ने भारत से लंदन जाकर कर्जन वायली की हत्या कर दी ।

ढींगरा को अँग्रेज़ों ने फाँसी पर चढ़ा दिया, लेकिन इससे विदेशों में रहने वाले भारतीयों में क्रांति की ज्वाला और भड़क उठी । 

ग़दर पार्टी की स्थापना

साल 1913 में अमेरिका में रहने वाले भारतीयों ने गदर पार्टी की स्थापना की ।

इस संगठन का एक ही मकसद था, 1857 की क्रांति की तरह से भारत में एक नयी क्रांति को जन्म देना और देश को आज़ादी दिलाना । माना जाता है की करतार सिंह सराभा और गदर पार्टी की शुरुआत सावरकर के विचारों से भी प्रभावित थी ।

सावरकर की किताब वॉर ऑफ इनडिपेंडेन्स 1857, में बताया गया था कि किस तरह 1857 की क्रांति के बाद उसी तरह की एक दूसरी क्रांति की ज़रूरत थी । 

उस वक़्त सावरकर एक क्रांतिकारी थे, और सावरकर ने लंबे समय तक जैल भी काटी ।

हालाँकि जेल में रहते हुए सावरकर ने कई बार ब्रिटिश हुकूमत से माफी माँगी थी । साथ ही हिंदुत्व की तरफ झुकाव और गाँधी की हत्या में नाम आने के बाद सावरकर ने अपनी प्रतिष्ठा को खो दिया था ।

बाद में सावरकर को गाँधी की हत्या के इल्ज़ाम से बरी कर दिया गया था । करतार सिंह क्या सावरकर के नये रूप से भी प्रभावित होते इन सवालों के जवाब कभी नहीं मिल पाए । 

लोगों को नयी क्रांति से जोड़ने के लिए एक अख़बार निकाला गया जिसके उपर साफ़ साफ शब्दों में लिखा होता था

“अंग्रेजी राज के दुश्मन”

कई भाषाओं में निकलने वाले इस अख़बार के पंजाबी एडिशन की जिम्मेदारी करतार सिंह सराभा को दी गई । इस समाचार पत्र में देशभक्ति से जुड़ी कवितायेँ  प्रकाशित की जाती थी जिनके माध्यम से भारतीयों से अँग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ एकजुट होने को संदेश होता था ।

ग़दर की क्रांति

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अँग्रेज़ों के उपर दबाव बहुत बढ़ गया था । उन्हें कई मोर्चों पर लड़ाइयाँ लड़नी पड़ रही थी । उसे जर्मनी के साथ युद्ध लड़ना पड़ रहा  था ।

ऐसे में गदर पार्टी के कार्यकर्ताओं का मानना था कि ऐसे समय में अगर भारत में क्रांति हो जाए तो अँग्रेज़ों के लिए उस विद्रोह को दबाना मुश्किल हो जाएगा । 

इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए करतार सिंह सराभा जैसी क्रांतिकारियों की अपील पर 8000 के करीब भारतीय विदेशों से भारत की और चल पड़े ।

करतार सिंह श्री लंका के रास्ते भारत पहुँचे और छिपकर क्रांति के लिए काम करने लगे । गदर पार्टी के साथ लोगों को जोड़ने, क्रांति के लिए हथियारों का इंतज़ाम करने के साथ साथ उन्होने बॉम्ब भी बनाए ।

21 फ़रवरी 1915 का दिन पूरे देश में अँग्रेज़ों के खिलाफ गदर के लिए निर्धारित किया गया । लेकिन किसी ने इसकी सूचना अँग्रेज़ों तक पहुँचा दी, जिसके बाद इस तारिक़ को बदल दिया गया ।

पर अँग्रेज़ों तक हर खबर पहले ही पहुच जाती थी । जिसके बाद ब्रिटिश हुकूमत ने गदर पार्टी के लोगों को पकड़ना शुरू कर दिया । 

रासबिहारी बोस भी क्रांति के लिए कोशिशों में लगे थे, लेकिन जब सभी साथी पकड़े जा रहे थे तो वो किसी तरह बचकर लाहौर से कलकत्ता पहुँचे और वहाँ से नकली पासपोर्ट बनवाकर जापान चले गये ।

करतार सिंह को भी उन्होने अफ़ग़ानिस्तान भाग जाने की सलाह दी लेकिन करतार सिंह नहीं गये और अभियान के लिए काम करते रहे ।

देश के लिए हुए शहीद

1857 की क्रांति में जिस तरह सैनिकों ने विद्रोह शुरू किया था उसी तरह से सैनिकों को जागरूक करने के लिए करतार सिंह फ़ौजी छावनियों में जा रहे थे ।

ऐसी ही एक कोशिश के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । करतार सिंह और उनके साथियों पर हत्या, डाका डालने और शासन को उलटने का आरोप लगाया गया ।

उन पर लाहोर षड्यंत्र के नाम से मुक़दमा चलाया गया । करतार सिंह की उमर बहुत कम थी लेकिन उनमें देश के लिए प्रेम अटूट था । भगत सिंह की तरह से ही उनमें देश के लिए जान देने की आतूरता थी ।

उन पर चले मुक़दमें के बाद जज ने उन्हें फाँसी की सज़ा सुनाई और कहा इतनी सी उम्र में ही यह लड़का ब्रिटिश साम्राज्य के लिए बहुत बड़ा खतरा है।

ना जाने करतार सिंह किस मिट्टी के बने थे, कोर्ट केस में आख़िरी सुनवाई के दौरान उन्होने कहा

“मैं चाहता हूँ मुझे फाँसी की सज़ा मिले ताकि में में फिर से भारत में जन्म लूँ और जब तक देश आज़ाद नहीं हो जाता तब तक में भारत में जन्म लेता रहूं”

फाँसी की सज़ा मिलने के बाद उन्हें बहुत खुशी हुई थी । वो एक समपन्न परिवार में पैदा हुए थे फिर भी उन्होने विद्रोह का रास्ता चुना था । 

कोर्ट में भी उन्होने कभी अपने बयानो को नर्म नहीं किया और सख़्त से सख़्त ब्यान दिए । इस पर एक बार जेल में उनके दादा जी उनसे मिलने पहुँचे तो उन्होने कहा की

“बेटा तुमने ये क्या किया

सभी रिश्तेदार तुम्हे बेवकूफ़ कह रहे हैं और कह रहे हैं कि तुम्हे क्या कमी थी “

इस पर करतार सिंह ने जवाब दिया था

“उनमें से हर कोई किसी ना किसी बीमारी से मर गया लेकिन देश की खातिर मरने का सोभाग्य सिर्फ़ मुझे मिला है”

इसके बाद 16 नवंबर 1915 को करतार सिंह को उनके 6 साथियों के साथ फाँसी दे दी गई ।

करतार सिंह जिस क्रांति की आग को सुलगता हुआ छोड़ गये थे उससे भगत सिंह ने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ो को हिला कर रख दिया । 

भगत सिंह हमेशा करतार सिंह की तस्वीर को अपने पास रखते थे । नोजवान भारत सभा नाम का युवा संगठन जिसमें भगत सिंह और उनके साथी मिलकर काम करते थे उनकी हर सभा में करतार सिंह की तस्वीर को मंच पर रखकर उसे पुष्पांजलि दी जाती थी ।

करतार सिंह सराभा ने देश की आज़ादी के लिए हंसते हंसते अपनी जान दे दी । इस आज़ादी को हमे संभाल कर रखना होगा क्यूंकि इसे पाने के लिए हमारे लोगों ने बहुत कुर्बानियां दी हैं ।

Mohan

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