कृष्ण भक्त मुसलमान : रहीम खान

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय | 
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे होय ||

हमारा देश भारत एक अनोखा देश है।  ये दुनिया का एकमात्र देश है जहा कितने ही धर्मों के लोग रहते है कितनी ही भाषाएँ बोलने वाले रहते हैं और आज से नहीं बल्कि सदियों से। 

भारत को विभिन्ताओं का देश माना जाता है। अलग अलग धर्म होने के बावजूद भी यह शांति प्रिय देश है यह के नागरिक जितना सत्कार अपने धर्म का करते हैं उतना ही दूसरे धर्मों का भी करते हैं।

rahim das biography in hindi
Rahim Das Biography in Hindi

इसी सत्कार की भावना हमे भारत के बहुत सरे साहित्यकारों की रचनाओं में मिलती हैं जो सर्वधर्म सत्कार की प्रेरणा देते है। उनकी रचनाये पढ़कर हम में इंसानियत, राष्ट्रप्रेम , धर्मप्रेम और दूसरे धर्मों के आदर की जो भावना उत्पन्न होती है वो शब्दों में ब्यान करनी मुश्किल है।  

जब इंसान को कोई दुःख या परेशानी होती है तो उसे सबसे पहले भगवान याद आ जाता है। हम मंदिरों मस्जिदों की तरफ भागते हैं और वही दूसरी तरफ जब दुःख के दिन दिन निकल जाते है और हमारे घर खुशियां आ जाती है तो हम उस भगवान को भूल जाते है।  पर अगर हम सुख के समय उस भगवान का धन्यवाद करे , सुख के समय उसे याद करे तो तो ऊपरवाला हमे दुःख के दिन देखने ही नहीं देता। 

हम बात कर रहे हैं छोटी छोटी पंक्तियों में और आसान भाषा में जिसे हरेक व्यक्ति बहुत आसानी से समझ सके , ऐसी रचनाये लिखने वाले सहित्यकार रहीम खान की।  जिनका भारतीय साहित्य में निभाई भूमिका को  किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। 

भारतीय संस्कृति में जितना हिस्सा कालिदास, सूरदास जी का है उतना ही हिस्सा रहीम खान जी का भी है।

जन्म और जवानी

अब्दुलर्रहीम खान-ए-खाना उर्फ़ रहीम खान जी का जन्म उस समय के भारत के मुग़ल सल्तनत के शाशक अकबर के राज्य में 17 दसंबर 1556 को हुआ। रहीम जी के पिता जी अकबर महराज के बहुत करीबी थे। रहीम जी के पिता जी का नाम बैरम खान था और वो राजा अकबर के निजी रक्षक थे। जब रहीम जी का जन्म हुआ तब उनके पिता जी की उम्र 60 साल की थी और रहीम जी का नाम राजा अकबर ने ही रखा था। 

रहीम जी का जन्म लाहौर में हुआ था। उनकी माता जी का नाम सुल्ताना बेग़म था और वो एक कवयित्री थी। 

रहीम जी के पिता जी बैरम खान एक बहदुर योद्धा थे। वो तुर्की देश से संबंध रखते थे। जब वो किशोरावस्था में थे तब वो हुमांयू की सेना में दाखिल हो गए और वो हुमायूँ के संरक्षक बन गए। उन्होंने पूरी उम्र हुमांयू की सेवा में लगा दी। बैरम खान ने हिन्दोस्तान में मुग़ल साम्राज्य स्थापित करने में हुमांयू की बहुत मदद की थी। 

हुमांयू ने जमाल खान की बड़ी बेटी से शादी कर ली थी और बैरम खान को आदेश दिया के वो जमाल खान की छोटी बेटी से शादी कर ले। बैरम ने अपने राजा की बात मानते हुए जमाल खान की छोटी बेटी सुल्ताना से शादी कर ली और उनके घर रहीम पैदा हुए। रहीम बचपन से ही राजा के चहिते थे। 

एक बार बैरम खान ने हज पर जाने की इच्छा जताई तो राजा ने उन्हें इजाजत दे दी और बैरम खान अपने बेटे और अपनी पत्नी के साथ हज यात्रा पर निकल गया। रस्ते में वो गुजरात रुके। वह पर वो पाटन नाम की जगह पर रुके। 

वहां का सहस्रलिंग तालाब बहुत मशहूर था तो बैरम खान उस तालाब में नहा कर जब अपने घर वापिस जा रहा था तो अचानक ही उसके एक पुराने दुश्मन अफ़ग़ान सरदार मुबारक ख़ाँ ने उसके ऊपर हमला करके बैरम खान को मर दिया इस बात का पता जब सुल्ताना को लगा तो वो अपने बेटे के साथ गुजरात में छुप गयी। 

उस समय रहीम खान की उम्र केवल 5 वर्ष थी।  इस बट का जब अकबर को पता चला तब अकबर ने सुल्ताना और रहीम को दिल्ली बुला लिया और सुल्ताना से शादी कर ली। 

महाराज अकबर ने रहीम जी की बहुत अच्छे से देखभाल की उन्हें वो सब चीजें दी गयी जो एक राजकुमार के पास होनी चाहिए उन्हें कभी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। रहीम खान को मुल्ला मुहम्मद अमीन के पास पढ़ने के लिए भेजा गया। मुल्ला मुहम्मद अमीन ने रहीम को भाषाओँ का ज्ञान दिया। उन्होंने मुल्ला मुहम्मद अमीन के पास अरबी , फ़ारसी भाषाएँ  सीखी और साहित्य के प्रति रूचि उनकी यहीं पर पैदा हुई। 

बेशक रहीम एक मुस्लिम परिवार में पैदा हुए थे पर वो हिन्दू धर्म और संस्कृति को उतना ही सम्मान देते थे जितना वो इस्लाम को देते थे।  

अरबी फ़ारसी के इलावा रहीम ने शाश्त्र विद्या भी सीखी।  तीर तलवारें चलाने में वो कुछ ही समय में माहिर हो गए थे। रहीम ने बदाऊनी जी से संस्कृत भाषा भी सीखी और छंद , दोहे , कविताएं रचना करनी भी सीखी और आज भी उनके लिखे दोहे लोगों के कंठस्त है और लोगो को सही रस्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। 

जब रहीम जी 16 वर्ष के हुए तो महाराज अकबर ने उनका विवाह माहबानो से करवा दिया जो अजीज कोका की बहन थी और अजीज कोका महाराज अकबर के बेहद खास थे।  रहीम जी के 3  पुत्र और 2 पुत्रियां हुई। 

रहीम और अकबर के संबंध 

रहीम जी अकबर के बहुत खास थे। महाराज अकबर ने उन्हें सभा में एक उचीं उपाधि दी हुई थी और कोई भी बड़ा फैसला वो रहीम जी की इजाजत के बिना नहीं लिया करते थे। महाराज अकबर ने रहीम जी को फ्रेश और अंग्रेजी भाषा सिखने के लिए भी खा और रहीम जी ने उनकी आज्ञा का पालन किया। 

1572 में महाराज अकबर गुजरात विजय के लिए गए तो 16 वर्षीय रहीम खान उनके साथ ही थे। और युद्ध खत्म होने तक अकबर के साथ ही रहे।  विजय प्राप्ति के बाद आज़म खान को गुजरात का सूबेदार बना दिया और अकबर और रहीम वापिस आ गए। 

गुजरती लोग आज़म खान को परेशान करने लग गए क्योकि वो आजमखान को पसंद नहीं करते थे। जब ये बात अकबर को पता चली तो वो वापिस गुजरात आ गए और साबरमती नदी के किनारे अपना डेरा डाल कर बैठ गए। 

उस समय रहीम ने बहुत   बहादुरी से दुश्मनों का सामना किया और महाराज अकबर की रक्षा पूरी बहादुरी से की।  उनकी इसी बहादुरी को देख कर महाराज अकबर खुश हुए। 

महाराज अकबर ने रहीम जी को अपने बेटे सलीमखां के शिक्षक के  रूप में नियुक्त किआ तो इससे वो बहुत खुश हुए। 

एक समय ऐसा भी आया जब अकबर साम्राज्य का पतन होने लग गया था क्योकि महाराज अकबर के ही उसके दरबार के अमीर ही उसके खिलाफ साजिश रचने लग गए थे और दक्षिण के राजा भी अकबर को परेशान करने लग गए थे तो इन्ही सब के बीच महाराज अकबर ने रहीम को गुजरात का सूबेदार नियुक्त करके भेजा। 

इसके इलावा रहीम जी ने गुजरात में महाराज अकबर के भट सरे दुश्मनों को हराया।  उन्होंने युद्ध की ऐसी ऐसी रणनीतियां बनाई जिससे दुश्मन चक्र जाता था। उन्होंने बहुत काम सेना के साथ ही उन्होंने मुज़्जफर खां को हरा दिया था मुज़्जफरखां के पास 40000 सैनिकों की फौज थी और वो साबरमती नदी के दूसरे तरफ खड़े थे जबकि रहीम के पास सिर्फ 10000 सैनिक थे। 

तो भी रहीम खान ने अपने सैनिकों का होंसला बढ़ाया और मुज़्जफरखां को परास्त किया। 

रचनाएँ

रहीमखां जी फ़ारसी, अरबी, संस्कृत, हिंदी भाषाओँ के धनी थे। हिंदी साहित्य के भक्तिकाल में उनकी एक अहम भूमिका है। उन्होंने अरबी फ़ारसी के साथ साथ संस्कृत और हिंदी में भी रचनाये लिखी और उनकी रचनाये जितनी मुसलमानों को पसंद आई  उतनी ही हिन्दुओं के दिलों को भी छूई। 

उनका व्यक्तित्व भी बहुत प्रभावशाली था।  वो हाज़िर जवाब थे और एक शूक्ष्म भूषि के मालिक थे उन्होंने अपनी समझ के बलबूते पर ही उन्होंने अकबर के 9 रत्नों में से एक की उपाधि हासिल की थी। 

रहीम जी की कुछ प्रसिद्ध रचनाओं में से :

  • श्रृंगार सतसई
  • रहीम सतसई
  • मदनाष्टक
  • रहीम रत्नावली 
  • बरवै नायिका-भेद
  • रास पंचाध्यायी
  • रहिमन विनोद
  • रहिमन शतक 
  • रहीम विलास 
  • रहीम कवितावली
  • रहिमन चंद्रिक

वो अपनी रचनाओं में ज्यादार खुद को रहिमन कह कर सम्बोधित करते थे। उनकी भाषा बहुत सरल और स्पष्ट होती थी। जो सीधा पाठक के दिमाग में असर करती थी।  रहीम जी ने संस्कृत और फ़ारसी दो विभिन्न भाषाओँ को मिला कर एक ग्रन्थ भी लिखा जो ज्योतिष पर आधारित था और ये इसी लिए खास था क्योकि इसमें दो विभिन्न तरह की भाषाओँ का मेल था इस ग्रंथ का नाम ‘खेट कौतूक जातकम्’ था। 

उन्होंने “नगर शोभा ” नाम का एक ग्रंथ लिखा जिसमे उन्होंने दोहे लिखे थे वो दोहे नगर में रहती स्त्रियों के बारे में थे वो दोहे ज्यादातर श्रृंगार रस को पेश करते थे। इसके इलावा उनकोने एक तुर्की ग्रंथ “वाक़यात बाबरी” को फ़ारसी में अनुवाद किया। 

राम न जाते हरिन संग से न रावण साथ 
जो रहीम भावी कतहूँ होत आपने हाथ

जैसे इस दोहे में वो ये समझते है के जो होना है वो होकर ही रहेगा।  जो नियति ने लिखा है वो हर हल में होगा उसे कोई रोक नहीं सकता। अगर सब कुछ हमारे हाथ में होता तो भगवान राम हिरण के पीछे न जाते और माता सीता को रावण हरण करके न ले जाता।  नियति के इस चक्क्र से कोई भी नहीं बच पता , जो होना है वो होगा हम उसे रोक नहीं सकते। 

रहीम जी की एक रचना मदनाशट भी है जो कृष्ण भगवान की रास लीला पर आधारित है रहीम जी ने इस रचना को संस्कृत और हिंदी भाषाओँ को मिला कर किया है। 

श्रृंगार , नीति और भक्ति इनकी रचनाओं में साफ झलकती है।  ये तीनो विषय इनकी ज़िंदगी से ही प्रभावित थे।  श्रृंगार रस इनको दरबार से मिला जहा अलग अलग जगह से कलाकार अपनी कलाओं का प्रदर्शन करने दरबार में आते थे।

बहुत सारी नृत्यकाएं विभिन्न तरह का नृत्य पेश करती थी जिससे इनको शृंगार रस मिला।  निति को इन्होने राज्य में सीखा कैसे एक सामान्य व्यक्ति अपने जिंदगी जीता है , उसे जीवन में कोनसी कोनसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है और और गलत रस्ते पर चल रहे लोगों को कैसे सही रास्ता दिखाना है ये उन्होंने सीखा और अपनी रचनाओं में पेश किया। 

भक्ति भावना उनके अंदर बचपन से ही थी।  वो बचपन से ही भगवान की भक्ति में लीन थे।  उन्होंने अरबी फ़ारसी संस्कृत भाषाएँ सीखी उन्होंने इस्लामिक , हिन्दू धर्मों के भट सरे ग्रंथ पढ़े।  भगवान को कैसे हासिल करे , उन्होंने जाना और लोगों को समझाया के भगवान हमे सिर्फ अच्छे कर्म करने से ही प्राप्र्त हो सकते हैं। 

बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय | 
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय ||

मुसलमान होते हुए भी वो एक कृष्ण भक्त थे। वो अपनी रचनाओं में कृष्ण, गीता के उल्लेख करते रहते थे। 

Download Rahim Dohe

मृत्यु

अकबर के बेटे जहाँगीर को मुग़ल सल्तनत का राजा बनाया गया परन्तु रहीम जी जहांगीर के राजा बनने के खिलाफ थे उन्हें जहाँगीर की नीतियां पसंद नहीं थी और उनके मुताबिक जहांगीर इतने बड़े साम्राज्य को संभालने के काबिल नहीं है। इस बात से जहांगीर बहुत गुस्सा हुआ और उसने रहीम खान के 2 बेटों को मरवा दिया। 

इसके बाद रहीम खान चित्रकूट आ गए। हिंदी साहित्य के  सुनहरी कल कहे जाने वाल  भक्तिकाल  के एक महान रचनाकार रहीम खान जी अपनी 70 साल की आयु पूरी करके चित्रकूट में अपने साँस त्याग गए।

उनकी याद में दिल्ली में एक मक़बरा भी बनवाया गया।  

रहीम खान जी ने बचपन से ही मुग़ल साम्राज्य की बहुत सेवा की थी। 

 उन्होंने समय आने पर युद्ध भी लड़े पर वो एक शांत स्वाभाव के थे युद्ध उन्हें पसंद नहीं थे परन्तु एक राजा का सच्चा सेवक होने के नाते उन्हें ऐसा करना पड़ा। 

एक मुस्लिम परिवार में पैदा होने के बावजूद भी रहीम खान भगवान कृष्ण, हिन्दुओं के पवित्र ग्रंथ गीता में बहुत विश्वास करते थे। वो हिन्दू धर्म को मानते थे।  

रहीम खान जी द्वारा रचित रचनाये आज भी भारतीय संस्कृति में एक अहम स्थान रखती है।  उनकी रचनाये सामाजिक और निजी नीतियों को बहुत अच्छे से पेश करती है। उनकी रचनाये आज भी उतनी ही कारगर हैं जितनी उस समय थी।  

आज के समय में बड़े से बड़ा साहित्यकार उनकी रचनाओं को भट आदर देते हैं और आज भी उनके दोहे भारत के हर घर में एक सुखमयी सुबह का कारण बनते हैं। 

इन्होने जो रचनाये हमारे समाज को दी हैं उसके लिए , जिस सहज तरीके से इन्होने हमे जीवन के मंत्रों को समझाया है उसके लिए हम इनके सदैव ऋणी रहेंगे। 

Rahul Sharma

हमारा नाम है राहुल,अपने सुना ही होगा। रहने वाले हैं पटियाला के। नाजायज़ व्हट्सऐप्प शेयर करने की उम्र में, कलम और कीबोर्ड से खेल रहे हैं। लिखने पर सरकार कोई टैक्स नहीं लगाती है, शौक़ सिर्फ़ कलाकारी का रहा है, जिसे हम समय-समय पर व्यंग्य, आर्टिकल, बायोग्राफीज़ इत्यादि के ज़रिए पूरा कर लेते हैं | हमारी प्रेरणा आरक्षित नहीं है। कोई भी सजीव निर्जीव हमें प्रेरित कर सकती है। जीवन में यही सुख है के दिमाग काबू में है और साँसे चल रही है, बाकी आज कल का ज़माना तो पता ही है |

Leave a Comment