वास्को डी गामा की भारत यात्रा Vasco Da Gama History

युरोप से भारत के समुद्री मार्ग की खोज करने वाले पुर्तगाली नाविक का नाम वास्को डी गामा था | वास्को डी गामा को पूरी दुनिया समुद्री रास्तों की खोज करने वाले एक नाविक के रूप में जानती है |

डी गामा ने 1497 में पुर्तगाल के लिज़्बन से अपनी यात्रा शुरू करके भारत की खोज का अभियान शुरू किया था | अफ्रीका में कई जगह रुकने के बाद वास्को डी गामा 1498 में पहली बार कालीकट के तट पर पहुँचा था |

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ये किसी युरोपियन का समुद्री मार्ग से भारत के तट पर पहुँचने का सबसे पहला सफल अभियान था | इस अभियान को पूरा करने में उसे 2 साल का वक़्त लगा  था जिसमें उसने 300 दिन समुद्र में बिताए थे और 24000 माइल्स की यात्रा की थी |

उस समय इतना लंबा समय समुद्र में बिताना बहुत मुश्किल काम था क्यूंकी समुद्र में आने वाले तूफान और बीमारियाँ सैंकड़ों लोगों की ज़िंदगियाँ निगल लेती थे | 

नाविक और सैनिक थे वास्को डी गामा

वास्को डी गामा का जन्म 1460 में पुर्तगाल में हुआ था | वो अपने पिता एस्तावो डी गामा के तीसरे बेटे थे | हम वास्को डी गामा को एक समुद्री खोजकर्ता के रूप में ही जानते हैं लेकिन वो एक सैनिक भी था |

1492 में पुर्तगाल के किंग जॉन II ने उसे फ्रांसीसी जहाज़ों को कब्ज़े में लेने के लिए सेतुबल की पोर्ट सिटी और ऑल्गार्वी क्षेत्र में भी भेजा था | क्यूंकी फ्रांसीसी जहाज़ों ने समुद्र में पुर्तगाली हितों को नुकसान पहुँचाया था |

वास्को डी गामा ने ये काम बड़ी बहादुरी और कुशलता से पूरा किया | भारत की ओर अपने अभियानो के दौरान वास्को डी गामा ने बहुत से अरब व्यापारियों से लड़ाइयाँ भी लड़ी थी | 

वास्को डी गामा एक बार नहीं बल्कि तीन बार भारत आया था और तीसरी बार भारत में ही उसकी मृत्यु हो गई थी | 

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व्यापार के लिए वास्को दी गामा ने की सफर की शुरुआत

जॉन II के बाद मनुएल वन पुर्तगाल के राजा बने | मनुएल वन ने वास्को डी गामा को भारत भेजा | वो चाहते थे कि भारत की ओर जाने वाले समुद्री रास्ते की खोज की जाए ताकि वेस्टर्न युरोप को पूर्व से सीधे जोड़ा जा सके | 

ऐसा नहीं था कि भारत के बारे में लोग जानते नहीं थे या भारत के साथ व्यापार नहीं हो रहा था | भारत के साथ लंबे समय से व्यापार होता आ रहा था लेकिन ज़मीनी मार्ग से |

ज़मीन के रास्ते लंबी दूरी तक समान पहुँचाना उस वक़्त बहुत ज़्यादा मुश्किल था | क्यूंकी ना तो उस समय ट्रेनें थी और ना ही ट्रक और हवाई जहाज़ | इसलिए ज़मीनी रास्तों से व्यापार बहुत खर्चीला और ख़तरनाक होता था |

ज़मीनी रास्ते से व्यापार करने के लिए अलग अलग देशों से होकर गुज़रना उस समय आसान नहीं था | ज़्यादातर व्यापार बिचौलियों के ज़रिए ही हो पाता था |

इन बिचौलियों की वजह से चीज़ें बहुत महंगी हो जाती थी और इन्हें बाईपास करके उत्पादन वाली जगहों तक पहुँचना बहुत मुश्किल था | जिसके पीछे बहुत से कारण थे, 632 में इस्लाम के उदय के बाद व्यापार के ज़्यादातर हिस्से पर अरबों का अधिकार हो गया था | 

दुनिया में ख़लीफाओं के आने के बाद पूर्व में ज़्यादातर व्यापार की बागडोर मुस्लिम व्यापारियों के हाथों में आ गई | व्यापार मार्गों पर इन मुस्लिम व्यापारियों का अधिकार हो गया था |

युरोपियन व्यापारियों को अगर भारत से व्यापार करना था तो उन्हें मुस्लिम मर्चेंट्स के ज़रिए ही व्यापार करना पड़ता था |

साथ ही व्यापार पर काबिज व्यापारी नहीं चाहते थे कि युरोपियन सीधे भारत से व्यापार करें | भारत में भी मुस्लिम व्यापारियों का पूरा दबदबा था | इन कारणों  से युरोपियन देश सीधे भारत से व्यापार नहीं कर पा रहे थे |

भारत के मसाले, कपड़े और हीरे जवाहरात उस समय पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध थे | मुग़ल अगर भारत नहीं आते तो कैसा होता भारत वाले लेख में हमने आपको बताया था कि कैसे 1000 ए डी में ही भारत की जीडीपी पूरी दुनिया की जीडीपी का 28.9% थी | 

और 17 वीं शताब्दी तक भारत 24.44% के साथ दुनिया में पहले स्थान पर था |

भारत के सोने की चिड़ियाँ होने के ख़बरे दूर दूर तक पहुँच चुकी थी | इसलिए युरोप के बहुत से देश भारत तक पहुँचने के समुद्री मार्ग की खोज में लगे हुए थे | 

केप ऑफ गुड होप से शुरू हुई खोज

वास्को डी गामा की तरह ही एक और एक्स्प्लोरर क्रिस्टोफर कोलंबस को भी भारत की खोज करने के लिए भेजा गया था |

लेकिन वो भारत पहुँचने की बजाए अमेरिका पहुँच गये | कोलंबस जब अमेरिका पहुँचा तो उसे लगा की वो भारत पहुँच गया है | इसीलिए उसे जो लोग मिले उसने उन्हें नाम दिया रेड इंडियन्स |

क्रिस्टोफर कोलंबस ने कैसे अमेरिका को ढूँढा और कैसे अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बन गया वो लेख भी आप यहाँ पढ़ सकते हैं | कोलंबस तो भारत को नहीं खोज पाए लेकिन वास्को डी गामा ने आख़िरकार भारत को खोज लिया था | 

वास्को डी गामा की खोज का मकसद भारत से व्यापार को बढ़ावा देना था | वास्को डी गामा से पहले एक दूसरे पुर्तगाली Bartolomeu Dias ने अफ्रीका  महाद्वीप के दक्षिण में केप ऑफ गुड होप को खोज लिया था | 

जिसके बाद वहाँ से भारत की और जाने का रास्ता खोजना आसान था |

मलिंदी होते हुए कालीकट पहुंचे वास्को डी गामा

8 जुलाई 1497 को वास्को डी गामा 170 लोगों के समूह के साथ लिज़्बन से 4 जहाज़ों पर भारत की खोज पर निकलते हैं | 

वो केनॅरी आईलैंड, साओ टियागो होते हुए मोस्सेल बे पहुँच गये | यहाँ गामा ने एक स्टोन पिल्लर लगवाया जिसे वो साथ ले गये थे ताकि जहाँ भी वो जाएँ वहाँ कुछ निशान बनाते जाएँ |

अफ्रीका में मोज़ांबिक़, मोम्बासा और मालिंदी में रुकने के बाद डी गामा ने भारत की ओर रुख़ किया | मोज़ॅमबीक के मुस्लिम लोगों को लगा की वास्को डी गामा और उनके साथी मुस्लिम हैं |

मोज़ांबिक़ के सुलतान ने डी गामा का स्वागत किया और उन्हें रास्ता दिखाने के लिए दो पाइलट दिए | पर जब उन्हें पता चला की वो मुस्लिम नहीं बल्कि क्रिस्टन हैं तो उन्होने वास्को डी गामा का विरोध किया |

ये सही है कि वास्को डी गामा का मकसद व्यापार को बढ़ाना था लेकिन पर्दे के पीछे उनका एक लोंग टर्म गोल भी था | वो था क्रिस्टन धर्म का प्रचार करना |

पुर्तगालियों को लगता था कि मुस्लिम धर्म के प्रचार प्रसार को रोकने और व्यापार पर उनके आधिपत्य को खत्म करने के लिए उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को क्रिस्टन बनाना होगा | 

भारत की ओर बढ़ते हुए बहुत बार उनका अरब ट्रेडर्स के साथ टकराव हुआ | वास्को डी गामा भी रास्ते में मिलने वाले अरब ट्रेडर्स की शिप्स को लूटते जा रहे थे |  जहाँ भी उन्हें बिना हथियारों के कमजोर ट्रेडर्स दिखते वो उन्हें लूट लेते थे | 

मोज़ांबिक़ से मोम्बासा होते हुए 14 अप्रैल 1498 को वो अफ्रीका के मलिंदी तट पर पहुँचे | यहाँ उन्हें एक लोकल नेविगेटर मिला जो की एक गुजराती था जिसकी मदद से उन्हें भारत का रास्ता पता चला |

24 अप्रैल को मलिंदी से वो भारत की ओर आगे बढ़ गये और 20 मई 1498 को आज के केरल के कालीकट के तट कप्पाड़ू पहुँच गये |

ज़मोरिन ने किया वास्को डी गामा का स्वागत

कालीकट के राजा ज़मोरिन किसी विदेशी जहाज़ के तट पर पहुँचे की बात सुनकर बहुत उत्साहित हुए और खुद तट पर पहुँच गये | 

क्यूंकी ज़मोरिन को लगा कि अगर उनसे मिलने कोई विदेशी आ रहा है तो ज़रूर उनके लिए कुछ ऐसे उपहार लाएगा जिसे देखकर उन्हें खुशी होगी |

लेकिन ज़मोरिन की सोच के विपरीत वास्को डी गामा कुछ ऐसी चीज़ें लाए थे जो ज़मोरिन को बिल्कुल पसंद नही आई | जैसे की टोपियां, कपड़े, चीनी, शहद और तेल के बैरल आदि |

ज़मोरिन वास्को डी गामा से कुछ बहुत अच्छा एक्सपेक्ट कर रहा था लेकिन उन उपहारों ने ज़मोरिन को निराश कर दिया | वास्को डी गामा ने ज़मोरिन को व्यापार करने का प्रस्ताव दिया लेकिन ज़मोरिन ने वो प्रस्ताव ठुकरा दिया और वास्को डी गामा को वापिस जाने के लिए कह दिया |

ज़मोरिन एक हिंदू राजा था लेकिन वास्को डी गामा और उसके क्रू को लगा की वो क्रिस्टन है | 29 अगस्त 1498 को वास्को डी गामा वापिस चल पड़ा लेकिन घर पहुँचने की जल्दी में उसने मानसून की हवाओं की दिशा को नज़रअंदाज कर दिया |

जिस कारण जहाँ आते हुए इंडियन ओसियन को पार करने में उसे 23 दिन लगे थे जाने के समय उसे 132 दिन का समय लगा | 7 जनवरी 1499 को वो मलिंदी के तट पर और फिर 10 जुलाई 1499 को वो वापिस पुर्तगाल पहुँच गये | 

पुर्तगाल पहुँचे पर उनका भव्य स्वागत हुआ और उसे डोम का टाइटल, सालाना पेंशन के साथ साथ ज़मीन भी दी गई | हालाँकि वास्को डी गामा ज़मोरिन के साथ कोई व्यापारिक संधि नहीं कर पाए थे लेकिन उन्होने भारत पहुँचे का समुद्री मार्ग खोज लिया था |

वास्को डी गामा का ये सफ़र आसान नहीं था क्यूंकी अपने सफ़र की शुरुवत वास्को डी गामा ने 170 लोगों के साथ की थी जबकि सिर्फ़ 54 लोग ही वापिस पुर्तगाल की धरती पर पहुँच पाए थे | 

उनके बहुत से साथी अरबों के हमलों में मारे गये थे तो बहुत से लोग स्कर्वी जैसी बीमारी की वजह से जान गवा बैठे थे | मरने वालों में वास्को डी गामा का भाई पाओलो भी शामिल था | 

वास्को डी गामा की दूसरी, तीसरी यात्रा

वास्को डी गामा के बाद “पेड्रो अलवारेस कॅब्रल” के नेतृत्व में बड़ी संख्या में सैनिकों को भारत भेजा गया | पेड्रो की मुस्लिम ट्रेडर्स के साथ भिड़ंत हुई जिसमें उसके 50 के करीब सैनिक मारे गये और पेड्रो ने भी जवाब में 10 मुस्लिम कार्गो वेसल्स को जला दिया जिसमें 600 के करीब नाविक मारे गये | 

इसके बाद दोबारा वास्को डी गामा 1502 में भारत आए | इस बार उनका मकसद ज़मोरिन और दूसरे अरब ट्रेडर्स से बदला लेना था और उन्हें ताक़त के बल पर ट्रीटी की शर्तों को मानने के लिए मजबूर करना था | 

वास्को डी गामा ने भी पेड्रो की तरह ताक़त का इस्तेमाल कर अरब ट्रेडर्स को मारा जिसकी वजह से पूरे भारत में उसे एक निर्दयी इंसान के रूप में देखा जाने लगा |

हालाँकि वास्को डी गामा इस बार भी व्यापार करने में उतना सफल नहीं हुआ और वापिस पुर्तगाल लौट आया |

अगले कुछ सालों तक वास्को डी गामा पुर्तगाल में रहा और भारत में चल रही पुर्तगाली गतिविधियों के लिए सलाह देते रहे लेकिन उन्हें ज़्यादा तवज्जो नहीं दी गई |

पर आख़िरकार 1519 में उन्हें मनुएल I ने फर्स्ट काउंट ऑफ विदिगुएईरा का टाइटल दिया और 1524 में जॉन III ने उन्हें भारत में वाइसराय नियुक्त किया | 

1524 में उन्हें फिर से भारत भेजा गया क्यूंकी भारत में करप्षन की वजह से पुर्तगाली सरकार की इमेज खराब हो रही थी | 1524 में जब वो तीसरी बार भारत आए तो भारत की ज़मीन पर ही बीमारी की वजह से उनकी मृत्यु हो गई |

इसके बाद उन्हें भारत में ही एक लोकल चर्च में दफ़ना दिया गया और उनके रिमेन्स को 1539 में वापिस पुर्तगाल लाया गया | 

Mohan

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